Sunday, June 16, 2019

पिताजी


पाँव मुझ लँगड़े के दोनों , हाथ मुझ करहीन के ,
आँख मुझ अंधे की दो , बहरे के दोनों कान हैं ।।
यदि कोई मुझसे ये पूछे , हैं पिताजी क्या तेरे ?
झट से कह दूँगा नहीं कुछ किंतु मेरे प्रान हैं ।।
माँ की महिमा तो जगत में व्याप्त है आरंभ से ,
किंतु क्या माहात्म्य कम है मातृ सम्मुख पितृ का ?
यदि पिताजी पर कोई मुझसे कहे दो शब्द लिख ,
सच तुरत लेकर कलम लिख दूँगा मैं भगवान हैं ।।
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-06-2019) को "पितृत्व की छाँव" (चर्चा अंक- 3369) (चर्चा अंक- 3362) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
पिता दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

बहुत बहुत धन्यवाद , शास्त्री जी ।

Anita saini said...

लाजबाब सृजन आदरणीय
सादर

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

बहुत बहुत धन्यवाद Anita saini जी ।

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...