Tuesday, April 30, 2019

मुक्त मुक्तक : 896 - देखते हैं


कि बेख़ौफ़ हो हम न डर देखते हैं ।।
मचल कर तेरी रहगुज़र देखते हैं ।।
तू दिख जाए खिड़की पे या अपने दर पर ,
तेरे घर को भर-भर नज़र देखते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

6 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (01-05-2019) को "संस्कारों का गहना" (चर्चा अंक-3322) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! शास्त्री जी ।

सु-मन (Suman Kapoor) said...

सुंदर

Anita saini said...

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज गुरुवार (02-05-2019) को " ब्लॉग पर एक साल " (चर्चा अंक-3323) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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अनीता सैनी

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! अनीता सैनी जी ।

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! सुमन कपूर जी ।

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...