Saturday, April 27, 2019

मुक्त मुक्तक : 894 - ख़्वाब


नींद नहीं जब-जब आती 
तब-तब बस ऐसे सोता मैं ।।
लेटे-लेटे आँखें खोले 
सौ-सौ ख्व़ाब पिरोता मैं ।। 
भूले-भटके सच हो जाएँ 
तो नच-नच पागल न बनूँ ,
टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ तो 
भी ना रोता-धोता मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...