मुक्त मुक्तक : 894 - ख़्वाब


नींद नहीं जब-जब आती 
तब-तब बस ऐसे सोता मैं ।।
लेटे-लेटे आँखें खोले 
सौ-सौ ख्व़ाब पिरोता मैं ।। 
भूले भटके सच हो जाएँ 
तो नच-नच पागल न बनूँ ,
चूर-चूर हो जाएँ तो भी 
ज़रा न रोता-धोता मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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