मुक्त मुक्तक : 893 - कोई देखे न.........


जाने क्यों सिर पे लोहा उठा , जैसे फूलों को ढोता हूँ मैं ।।
छटपटाऊँ न काँटों पे चल , बल्कि सच शाद होता हूँ मैं ।।
तुम न मानोगे मैं बेतरह , कोई देखे न ऐसी जगह ,
आज भी उसकी यादों में इक, भूखे बच्चे सा रोता हूँ मैं ।। 
( शाद = प्रसन्न , बेतरह = अत्यधिक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Anita saini said…
जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-04-2019) को "भीम राव अम्बेदकर" (चर्चा अंक-3306) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
- अनीता सैनी
धन्यवाद ! Anita Saini जी ।
Navneet Malviya said…
Dear sir
Awesome line in your poem so can I post your poem on social sites with your name..? If u will give ur permission to me?

Thanks & Regards
Navneet malviya
अवश्य नरेन्द्र मालवीय जी.......किंतु कृपया नाम और लिंक अनिवार्यतः उल्लेखित करें । धन्यवाद ।
अवश्य ही नवनीत मालवीय जी..... किंतु कृपया नाम और वेबसाइट लिंक अनिवार्यतः उल्लेखित करें..... प्रतिक्रिया का आभार ।

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