रँग डाला........


मैंने सत्य मानों प्रेमवश , 
बुरी तरह तुमको रँंग डाला ।।
सच बोलूँ मैं माथ शपथ धर , 
बुरी तरह उनको रँंग डाला ।।
किंतु हाय तुम दोनों ने मिल , 
इक प्रतिकार की भाँति पकड़ फिर ,
भाँति भाँति के वर्ण घोलकर , 
बुरी तरह मुझको रँग डाला ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

शुभकामनाएं रंगों के त्योहार की।
आपको भी अनंत शुभकामनाएँँ.......
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (24-03-2019) को "चमचों की भरमार" (चर्चा अंक-3284) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत बहुत धन्यवाद ! शास्त्री जी ।

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