दोहा ग़ज़ल


वो जब अपने सामने , पड़ जाते हैं यार ।।
होश गवाँ करने लगें , हम उनके दीदार ।।
हँसते हैं जब वो यही , होता है महसूस ,
जैसे खनकें पायलें , कोयल गाए मल्हार ।।
जिनसे इश्क़ हक़ीक़तन , करते हम कमबख़्त ,
वो ग़ैरों के प्यार में , रहते हैं बीमार ।।
उनके हिज्र में रात यों , बरसी आँखें दोस्त ,
ज्यों सावन में भी नहीं , होती धारासार ।।
उनकी खुशियों का वहाँ , कोई ओर न छोर ,
अपने भी ग़म का न याँ , दिखता पारावार ।।
उनकी आँख में आज भी , हम कोल्हू के बैल ,
पहले भी बेकार थे , अब भी हैं बेकार ।।
वह जब तक अपना रहा , दुनिया लगी हबीब ,
वह जब ग़ैर हुआ हुआ , ज्यों बैरी संसार ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (18-03-2019) को "उभरे पूँजीदार" (चर्चा अंक-3278) (चर्चा अंक-3264) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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