सिर काटेंगे




आकाश तड़ित सा लपक लपक दुश्मन पर गिर गिर काटेंगे ।।
यदि आज नहीं यदि अभी नहीं तो हम किस दिन फिर काटेंगे ?
अब आँख के बदले आँख नहीं ना हाथ हाथ के बदले में , 
अब तो अपनी इक उँगली भी कटती है हम सिर काटेंगे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-02-2019) को "श्रद्धांजलि से आगे भी कुछ है करने के लिए" (चर्चा अंक-3250) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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अमर शहीदों को श्रद्धांजलि के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! शास्त्री जी ।
Anita saini said…
सुन्दर | सीने में जल रही ज्वालामुखी को अब ठण्डी न होने देना |कभी सर कट्टे कभी बम के धमाके अब कुछ सहने की हिम्मत नहीं है |कुछ ऐसा करों आम जन की आवाज़ सेना की वर्दी साफा केसरिया पहनों |नेता नहीं देश की बागडोर अपने हाथों में थामों |नमन
सादर
धन्यवाद ! अनिता. सैनी जी ।

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