मुक्त ग़ज़ल : 271- कनीज़


मैं तो सिर्फ़ एक कनीज़ हूँ ।।
तुम्हें किस लिए फिर अज़ीज़ हूँ ?
हूँ खिलौना मुझसे लो खेल लो ,
कि मैं आदमी नहीं चीज़ हूँ ।।
मुझे तुम धुएँ में ले आए फिर ,
मैं दमा का जबकि मरीज़ हूँ ।।
मुझे मारने का है हुक़्म उसे ,
कि मैं जिसका जानी हफ़ीज़ हूँ !!
न छुपाए पुश्त न सीना ही ,
मैं वो तार - तार कमीज़ हूँ ।।
न निगाह देख के मैली कर -
मुझे मैं बहुत ही ग़लीज़ हूँ ।। 
न उठाके गोदी में ले मुझे ,
बड़ा भारी और दबीज़ हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (25-02-2019) को "आईने तोड़ देने से शक्ले नही बदला करती" (चर्चा अंक-3258) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी ।
Anil Janvijay said…
न छुपाए पुश्त न सीना ही ,
मैं वो तार - तार कमीज़ हूँ ।।
न निगाह देख के मैली कर -
मुझे मैं बहुत ही ग़लीज़ हूँ ।।
शुक्रिया....Anil Janvijay जी ।

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......

मुक्त ग़जल : 254 - चोरी चोरी