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Thursday, February 28, 2019

काग


  चोंच से खींचकर काग आँचल तेरा ।।
  बोले उससे भी काला है काजल तेरा ।।
  रंग पूनम से उजला , अमावस लटें ,
  मुख तो अमृत सा पर मन हलाहल तेरा ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, February 24, 2019

मुक्त ग़ज़ल : 271- कनीज़


मैं तो सिर्फ़ एक कनीज़ हूँ ।।
तुम्हें किस लिए फिर अज़ीज़ हूँ ?
हूँ खिलौना मुझसे लो खेल लो ,
कि मैं आदमी नहीं चीज़ हूँ ।।
मुझे तुम धुएँ में ले आए फिर ,
मैं दमा का जबकि मरीज़ हूँ ।।
मुझे मारने का है हुक़्म उसे ,
कि मैं जिसका जानी हफ़ीज़ हूँ !!
न छुपाए पुश्त न सीना ही ,
मैं वो तार - तार कमीज़ हूँ ।।
न निगाह देख के मैली कर -
मुझे मैं बहुत ही ग़लीज़ हूँ ।। 
न उठाके गोदी में ले मुझे ,
बड़ा भारी और दबीज़ हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, February 16, 2019

सिर काटेंगे




आकाश तड़ित सा लपक लपक दुश्मन पर गिर गिर काटेंगे ।।
यदि आज नहीं यदि अभी नहीं तो हम किस दिन फिर काटेंगे ?
अब आँख के बदले आँख नहीं ना हाथ हाथ के बदले में , 
अब तो अपनी इक उँगली भी कटती है हम सिर काटेंगे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति