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Showing posts from February, 2019

काग

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चोंच से खींचकर काग आँचल तेरा ।।
  बोले उससे भी काला है काजल तेरा ।।
  रंग पूनम से उजला , अमावस लटें ,
  मुख तो अमृत सा पर मन हलाहल तेरा ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 271- कनीज़

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मैं तो सिर्फ़ एक कनीज़ हूँ ।। तुम्हें किस लिए फिर अज़ीज़ हूँ ? हूँ खिलौना मुझसे लो खेल लो , कि मैं आदमी नहीं चीज़ हूँ ।। मुझे तुम धुएँ में ले आए फिर , मैं दमा का जबकि मरीज़ हूँ ।। मुझे मारने का है हुक़्म उसे , कि मैं जिसका जानी हफ़ीज़ हूँ !! न छुपाए पुश्त न सीना ही , मैं वो तार - तार कमीज़ हूँ ।। न निगाह देख के मैली कर - मुझे मैं बहुत ही ग़लीज़ हूँ ।।  न उठाके गोदी में ले मुझे , बड़ा भारी और दबीज़ हूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

सिर काटेंगे

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आकाश तड़ित सा लपक लपक दुश्मन पर गिर गिर काटेंगे ।। यदि आज नहीं यदि अभी नहीं तो हम किस दिन फिर काटेंगे ? अब आँख के बदले आँख नहीं ना हाथ हाथ के बदले में , 
अब तो अपनी इक उँगली भी कटती है हम सिर काटेंगे ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति