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Showing posts from 2019

मुक्तक : 915 - ग़ुस्सा

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रेलगाड़ी गुज़रे जर्जर पुल से ज्यों कोई ,
इस तरह दिल देख उसको धड़धड़ाता है ।।
तक मुझे ता'नाज़नी करता वो कुछ ऐसी ,
कान में पिघला हुआ ज्यों काँच जाता है ।।
मैं न ग़ुस्सेवर ज़रा पर पार कर जाए ,
देखकर उसको मेरा सात आस्माँ ग़ुस्सा ,
जोंक बनकर जिसने मेरी ज़िंदगी चूसी ,
उसका पी जाने को ख़ूँ मैं कसमसाता हूँ ।। 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 914 - मरीज़-ए-इश्क़

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मैंने माना मैं मरीज़-ए-इश्क़ तेरा ,  और तू मेरे लिए बीमार है , हाँ ।। दरमियाँ अपने मगर सदियों पुरानी ;  एक पक्की चीन की दीवार है , हाँ ।। इक बड़ा सा फ़र्क़ तेरी मेरी हस्ती ;  ज़ात , मज़हब , शख्स़ियत , औक़ात में है , यूँ समझ ले मैं हूँ इक अद्ना सी मंज़िल ;  तू फ़लकबोस इक कुतुबमीनार है , हाँ ।। ( दरमियाँ = मध्य , फ़लकबोस = गगनचुंबी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

तिरंगा

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बात करता है तिरंगे को जलाने की ।। कोशिशें करता है भारत को मिटाने की ।। ये सितारा-चाँद हरे रँग पर जड़े झण्डा , सोचता है बंद हवा में फरफराने की ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 913 - स्वप्न

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दादुर उछल शिखी को नचना सिखा रहा है ।। ज्ञानी को अज्ञ अपनी कविता लिखा रहा है ।। उठ बैठा चौंककर मैं जब स्वप्न में ये देखा , इक नेत्रहीन सुनयन को अँख दिखा रहा है ।। ( दादुर = मेंढक , शिखी = मोर , अज्ञ = मूर्ख ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 912 - तस्वीर

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धागा भी हो गया इक ज़ंजीर आज तो ।। काँटा भी लग रहा है शमशीर आज तो ।। कल तक की भीगी बिल्ली बन बैठी शेरनी , तब्दीलियों की देखो तस्वीर आज तो ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 911 - हुजूर

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सोचा नहीं था मुझसे मेरा हुजूर होगा ।। जितना क़रीब था वो उतना ही दूर होगा ।। मैं मानता कहाँ हूँ दस्तूर इस जहाँ का  , आया है जो भी उसको जाना ज़रूर होगा ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 910 - बारिश

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उनसे मिलकर हमको करना था बहुत कुछ रात भर ।।  कर सके लेकिन बहुत कुछ करने की हम बात भर ।। नाम पर बारिश के बदली बस टपक कर रह गयी , हमने भी कर उल्टा छाता उसमें ली बरसात भर ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 909 - बरसात

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उड़-दौड़-चलते-चलते थक स्यात् रुक गई है ।। हो-होके ज्यों झमाझम दिन-रात चुक गई है ।। छतरी न थी तो बरखा रह-रह बरस रही थी , छाता खरीदते ही बरसात रुक गई है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 908 - गर्मी की दोपहर

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लाकर कहीं से उनपे बादलों को छाऊँ मैं ।। 
भरभर हिमालयों से बर्फ जल चढ़ाऊँ मैं ।।
गर्मी की दोपहर के सूर्य से वो जल रहे ,
सोचूँ किसी भी तरह से उन्हें बुझाऊँ मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 907 - छाता

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आता हुआ मैं या फिर जाता ख़रीद लूँ ।। मन को हो नापसंद या भाता ख़रीद लूँ ।। लेकिन ये लाज़िमी है बाज़ार से कोई , बरसात आ रही इक छाता ख़रीद लूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 906 - पत्तल

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किस पाप की सख़्त सज़ा चुप ऐसे काट रहा है ?
इस क़दर है क्यों बेकस वो कभी जो लाट रहा है ?
हैराँ हूँ कई पेटों को पालने वाला वह क्यों ,
बिलबिला भूख से जूठी पत्तल चाट रहा है ?
( बेकस = असहाय , लाट = लार्ड शब्द का अपभ्रंश )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

सेल्फ़ी

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सब वफ़ादारी मेरी फिर आपकी , 
सिर्फ़ अपनापन ज़रा सा दीजिए ।।
ख़ूबसूरत मैं भी हूँ मुझ पर अगर , 
प्यार से अपनी नज़र इक कीजिए ।।
कुछ नहीं सचमुच नहीं कुछ आज बस , 
चाहता हूँ आप अपने हाथ से ,
सेल्फ़ी तो ख़ूब खींचीं आपने , 
इक मेरी तस्वीर भी ले लीजिए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 906 - बोलो न अहमक़

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जो बेमौत मारे गए या मरे ख़ुद , 
उन्हें तुम किसी हक़ से बोलो न अहमक़ !!
गर इतना जो हो जाता दुनिया में शायद , 
ज़मीं ही फिर हो जाती जन्नत बिलाशक़ !!
नदी-कूप पर होता प्यासों का क़ब्ज़ा , 
ग़रीबों , फ़क़ीरों का दौलत पे कुछ हक़ ,
जो होता ज़रूरी वो पास होता सबके ,
तो फिर ख़ुदकुशीे क्यों कोई करता नाहक़ ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 905 - तिरकिट

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तिरकिट-धा-तिनक-धिन-धिन 
तबला बजा बजाकर ।।
अख़बार सुर्ख़ियों की 
ख़बरें सुना सुनाकर ।।
लेकिन वो अपने दर्दो 
ग़म की कहानियों को ,
बेचे कभी न हरगिज़ 
आंँसू बहा बहा कर ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 904 - फाड़कर

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पथरीली सरज़मीं पर 
कर करके गहरे गड्ढे ,
फिर से न आएँ बाहर 
ऐसे मैं गाड़कर ।।
हरगिज़ न कोई दर्जी 
फिर से जो सिल सके ,
कुछ इस तरह के टुकड़े 
टुकड़ों में फाड़कर ।।
कुछ आपके वहाँ का , 
कुछ मेरे भी यहाँ का ,
जानूँ न कैसा-कैसा ,
जाने कहाँ-कहाँ का ?
आँखों से अपनी चुन-चुन 
देखो मैं बेच घोड़े ,
सपनों का सारा कचरा 
सोता हूँ झाड़ कर ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 903 - गैया

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अनुमान भी न तुम लगा सकोगे कि भैया ,
किस सोच में बैठा हूँ चराते हुए गैया ?
दिखता हूँ किनारे पे किंंतु हूँ मैं भँवर में , 
कैसे लगेगी पार मेरी कागज़ी नैया ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 992 - चकोरा

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कब मेरी जानिब वो शर्माकर बढ़ेंगे यार ?
जो मैं सुनना चाहूँ वो कब तक कहेंगे यार ?
ज्यों चकोरा चाँद को सब रात देखे है ,
इक नज़र भर भी मुझे वो कब तकेंगे यार ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 901- बैठ जाता हूँ

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मैं उनके सामने ख़ुद को गिराकर बैठ जाता हूँ ।।
उठे सर को सलीक़े से झुकाकर बैठ जाता हूँ ।।
मुझे सर पर बिठाने वो रहें तैयार लेकिन मैं ,
हमेशा उनके क़दमों में ही जाकर बैठ जाता हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 275 - गुलबदन

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काँटे न थे हमेशा से , थे इक चमन कभी ।।
पत्थर से जिस्म वाले हम , थे गुलबदन कभी ।।
महफ़िल में भी रहे हम आके यक़्कोतन्हा आज ,
जो अपने आप में थे एक अंजुमन कभी ।।
चंद हादसों ने सच में क्या से क्या बना दिया ,
जैसे हैं आज वैसे तो न थे अपन कभी ।।
मिट्टी के ढेले बन के रह गए हैं आजकल ,
आता नहीं यक़ीं कि सच थे हम रतन कभी ।।
बारिश के रूठने से बन के नाली रह गए ,
हम भी थे दसियों साल पहले तक जमन कभी ।।
पीरी में सारी शोख़ियों ने अलविदा कहा ,
जोबन में हम में भी ग़ज़ब था बाँकपन कभी ।।
( यक़्कोतन्हा = नितांत अकेला , जमन = यमुना नदी  , पीरी = वृद्धावस्था )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 900 - ग़म का छुपाना

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किसी गिर पड़े को झपट कर उठाना ।।
किसी ज़ख़्म खाए को मरहम लगाना ।।
ये आदत तुम्हारी नहीं ताज़ा-ताज़ा , 
है ये शौक तुममें निहायत पुराना ।।
हमें सब पता है कि क्या माज़रा है ,
कि क्या मग़्ज़े सर में क्या दिल में भरा है ?
तुम्हारा ये हर वक्त का मुस्कुराना ,
हमें सिर्फ़ लगता है ग़म का छुपाना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक

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सब्र से कुर्सी पे भी सच बैठते कब हैं ?
नींद भी लेते खड़े ही लेटते कब हैं ?
हर तरफ़ माहौल बेशक़ ख़ूबसूरत है ,
आँख रखकर भी मगर हम देखते कब हैं ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

अक़्ल

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हैं उसके अक़्ल वाले द्वार बंद देखिए ।।
लेकिन दयालुता भरी पसंद देखिए ।।
करता है आज कौन उल्लुओं से दोस्ती ,
भैंसों से प्यार करता अक़्लमंद देखिए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1718577278287991&id=100004072065187

पिताजी

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पाँव मुझ लँगड़े के दोनों , हाथ मुझ करहीन के ,
आँख मुझ अंधे की दो , बहरे के दोनों कान हैं ।।
यदि कोई मुझसे ये पूछे , हैं पिताजी क्या तेरे ?
झट से कह दूँगा नहीं कुछ किंतु मेरे प्रान हैं ।।
माँ की महिमा तो जगत में व्याप्त है आरंभ से ,
किंतु क्या माहात्म्य कम है मातृ सम्मुख पितृ का ?
यदि पिताजी पर कोई मुझसे कहे दो शब्द लिख ,
सच तुरत लेकर कलम लिख दूँगा मैं भगवान हैं ।।
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 899 - ग़ुस्सा

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मेरे ग़ुस्से को फूँक - फूँक मत हवा दे तू ।। मैं भड़क जाऊँ उससे पहले ही बुझा दे ।। मैं बरस उट्ठा तो दुनिया बहा के रख दूँगा , अब्र को मेरे नीला आसमाँ बना दे तू ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 898 - ज़ुर्म

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ज़ुर्म वो साज़िशन रोज़ करते रहे ।।
दूसरे उसका ज़ुर्माना भरते रहे ।।
ज़ख़्म तो फूल ही दे रहे थे मगर ,
सारा इल्ज़ाम काँटों पे धरते रहे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 897 - मैं कहाँ हूँ ?

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दिख रहा सबको वहीं बैठा जहाँ हूँ ।।
हूँ वहीं पर वाँ मगर सचमुच कहाँ हूँ ?
दिल मेरा आवारगी करता जिधर है ,
दरहक़ीक़त मैं यहाँ कब ? मैं वहाँ हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 896 - देखते हैं

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कि बेख़ौफ़ हो हम न डर देखते हैं ।। मचल कर तेरी रहगुज़र देखते हैं ।। तू दिख जाए खिड़की पे या अपने दर पर , तेरे घर को भर-भर नज़र देखते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 895 - मुस्कुराहट

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लोग कहते हैं मैं मुस्कुराता नहीं ।।
मैं ये कहता हूँ मैं कुछ छुपाता नहीं ।।
हर तरफ़ मुश्किलें , बंद राहें सभी ;
कौन ऐसे में फिर मुँह बनाता नहीं ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 894 - ख़्वाब

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नींद नहीं जब-जब आती 
तब-तब बस ऐसे सोता मैं ।।
लेटे-लेटे आँखें खोले 
सौ-सौ ख्व़ाब पिरोता मैं ।। 
भूले भटके सच हो जाएँ 
तो नच-नच पागल न बनूँ ,
चूर-चूर हो जाएँ तो भी 
ज़रा न रोता-धोता मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 274 - सिर पे आफ़्ताब

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न जब नशा मैं करूँ साथ क्यों शराब रखूँ ? 
लगे न प्यास तो हाथों में फिर क्यों आब रखूँ  ?
मैं सख़्त उम्मी हूँ दुनिया को यह पता है मगर ,
मैं अपने हाथों में हर वक़्त क्यों किताब रखूँ ?
मुझे पसंद है दिन में भी तीरगी ही वले ,
तो क्यों मैं रात उठा सिर पे आफ़्ताब रखूँ ?
मैं इक नज़ीर हूँ दुनिया में मुफ़्लिसी की बड़ी ,
मुझे क्या हक़ है कि आँखों में फिर भी ख़्वाब रखूँ ?
वो मुझको चाहे न चाहे ये उसकी मर्ज़ी अरे ,
मैं उसको कितना करूँ प्यार क्यों हिसाब रखूँ ?
वो मुझको क़तरा भी रखता नहीं है देने कभी ,
मैं उसको सौंपने हर वक़्त क्यों तलाब रख़ूँ ?
तरसता है वो मेरे मैं भी उसके दीद को फिर ,
मिले कहीं वो मैं चेहरे पे क्यों हिजाब रखूँ ?
[ आब = जल // उम्मी = अनपढ़ // तीरगी = अंधकार // 
वले = किंतु // आफ़्ताब = सूर्य // नज़ीर = उदाहरण // 
मुफ़्लिसी = ग़रीबी // क़तरा = बूँद // दीद = दर्शन // हिजाब = घूँघट ]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 893 - कोई देखे न.........

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जाने क्यों सिर पे लोहा उठा , जैसे फूलों को ढोता हूँ मैं ।। छटपटाऊँ न काँटों पे चल , बल्कि सच शाद होता हूँ मैं ।। तुम न मानोगे मैं बेतरह , कोई देखे न ऐसी जगह , आज भी उसकी यादों में इक, भूखे बच्चे सा रोता हूँ मैं ।।  ( शाद = प्रसन्न , बेतरह = अत्यधिक ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

चौकीदार

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उनके जिनके मंत्रियों से सीधे व्यवहार ।।
करते उनमें से कई चोरी-भ्रष्टाचार ।।
उस पर तुर्रा यह कि चढ़ मंचों पर बेशर्म ,
चिल्ला-चिल्ला बोलते हम हैं चौकीदार ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

कुल्फ़ी

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कभी चूसते रहे तो कभी काटते रहे ।।
दाँतों से बर्फ़-टुकड़ों को बाटते रहे ।।
गर्मीे में कैसे पाएँ ठंडक ये सोचकर ,
कुल्फ़ी को ले ज़ुबाँ पर हम चाटते रहे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 892 - मौत

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हर जगह ही ज़िंदगी पर मौत भारी है ।।
ज़िंदगी भी मौत से हर बार हारी है ।।
फिर ज़माने में ज़माने से मैं हैराँ हूँ ,
ज़िंदगी और मौत की क्यों जंग जारी है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 273 - त्योहार

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परेशाँ करने वालों को न ख़िदमतगार कहिएगा ।।
बिठा पहरे पे चोरों को न चौकीदार कहिएगा ।।
वतन के वास्ते जो जाँ हथेली पर लिए घूमें ,
न हों फ़ौजी भी तो उनको सिपहसालार कहिएगा ।।
न चिनवाओ उन्हें ज़िंदा ही तुम दीवार में लेकिन ,
मसूदों को सरेआम एक सुर ग़द्दार कहिएगा ।।
जो बनकर बैल कोल्हू के लगे रहते हैं मेहनत में ,
कमाई की नज़र से मत उन्हें बेकार कहिएगा ।।
कभी भूले भी जो हटता नहीं उसके हसीं रुख़ से ,
उसे पर्दा न कहकर जेल की दीवार कहिएगा ।।
कोई पूछे कि अब हम क्यों न होंगे ठीक तो हमको 
बस उसके कान में जा इश्क़ का बीमार कहिएगा ।।
कहो मत ईद को ,क्रिसमस को ,दीवाली को ,होली को
ग़रीबी नाच उठे जिस दिन उसे त्योहार कहिएगा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

रँग डाला........

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मैंने सत्य मानों प्रेमवश , 
बुरी तरह तुमको रँंग डाला ।।
सच बोलूँ मैं माथ शपथ धर , 
बुरी तरह उनको रँंग डाला ।।
किंतु हाय तुम दोनों ने मिल , 
इक प्रतिकार की भाँति पकड़ फिर ,
भाँति भाँति के वर्ण घोलकर , 
बुरी तरह मुझको रँग डाला ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

दोहा ग़ज़ल

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वो जब अपने सामने , पड़ जाते हैं यार ।।
होश गवाँ करने लगें , हम उनके दीदार ।।
हँसते हैं जब वो यही , होता है महसूस ,
जैसे खनकें पायलें , कोयल गाए मल्हार ।।
जिनसे इश्क़ हक़ीक़तन , करते हम कमबख़्त ,
वो ग़ैरों के प्यार में , रहते हैं बीमार ।।
उनके हिज्र में रात यों , बरसी आँखें दोस्त ,
ज्यों सावन में भी नहीं , होती धारासार ।।
उनकी खुशियों का वहाँ , कोई ओर न छोर ,
अपने भी ग़म का न याँ , दिखता पारावार ।।
उनकी आँख में आज भी , हम कोल्हू के बैल ,
पहले भी बेकार थे , अब भी हैं बेकार ।।
वह जब तक अपना रहा , दुनिया लगी हबीब ,
वह जब ग़ैर हुआ हुआ , ज्यों बैरी संसार ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 272 - मुक्का-लात

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किस मज्बूरी के चलते यह बात हुई है ?
  जो अंधों के आगे नचते रात हुई है ।।
  हैराँ हूँ सुनकर इक बुलबुल के हाथों कल ,
  अंबर में बाज़ों की भारी मात हुई है ।।
  झूठ है सिर्फ़ अमीर ही बख्श़िश दें जग में , क्या 
  मँगतों के हाथों न कभी ख़ैरात हुई है ?
  भूखे सिंह को ज्यों बकरी भी दिखती हिरनी ,
  उनकी आँखों में यूँ मेरी औक़ात हुई है ।।
  रेगिस्तान तरसते रोते याँ बदली को , 
  वाँ दिन-रात समंदर में बरसात हुई है ।।
  तुम क्या जानो हम क्यों रोज़ ज़हर पीते हैं ?
  हम ही जानें हमको मौत हयात हुई है ।।
  वे दोनों गाँधीवादी हैं पर उनमें भी ,
  मेरे आगे अक्सर मुक्का-लात हुई है !!
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल मुक्तक

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बुलाके पास जो 
आवारा क़िस्म कुत्ते को ,
खिलाके बिस्कुट और 
सिर्फ़ एक हड्डे को ,
सुनाने बैठ गया 
अपनी अनसुनी ग़ज़लें ,
अदब से वो भी खड़ा 
हो गया था सुनने को ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

काग

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चोंच से खींचकर काग आँचल तेरा ।।
  बोले उससे भी काला है काजल तेरा ।।
  रंग पूनम से उजला , अमावस लटें ,
  मुख तो अमृत सा पर मन हलाहल तेरा ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 271- कनीज़

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मैं तो सिर्फ़ एक कनीज़ हूँ ।। तुम्हें किस लिए फिर अज़ीज़ हूँ ? हूँ खिलौना मुझसे लो खेल लो , कि मैं आदमी नहीं चीज़ हूँ ।। मुझे तुम धुएँ में ले आए फिर , मैं दमा का जबकि मरीज़ हूँ ।। मुझे मारने का है हुक़्म उसे , कि मैं जिसका जानी हफ़ीज़ हूँ !! न छुपाए पुश्त न सीना ही , मैं वो तार - तार कमीज़ हूँ ।। न निगाह देख के मैली कर - मुझे मैं बहुत ही ग़लीज़ हूँ ।।  न उठाके गोदी में ले मुझे , बड़ा भारी और दबीज़ हूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

सिर काटेंगे

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आकाश तड़ित सा लपक लपक दुश्मन पर गिर गिर काटेंगे ।। यदि आज नहीं यदि अभी नहीं तो हम किस दिन फिर काटेंगे ? अब आँख के बदले आँख नहीं ना हाथ हाथ के बदले में , 
अब तो अपनी इक उँगली भी कटती है हम सिर काटेंगे ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

विवाह आभार पत्र

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आपने करबद्ध हो हम को नमन शत-शत किया ।।
अपना नीलाकाश से भी उच्च मस्तक नत किया ।।
झुक गए प्रत्येक बाराती भी आगे आपके ,
आपने कुछ इस तरह उनका सुहृद् स्वागत किया ।।
कौन करता है किसी का आजकल अब इस तरह ।।
आपने सम्मान हमारा सच किया है जिस तरह ।।
सोचते हैं हम बहुत अभिभूत होकर आपका ,
यदि करें आभार का प्रकटीकरण तो किस तरह ?
                                             - वर का पिता
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

विवाह अभिनंदन पत्र

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कर सरस्वती को नमन प्रथम गणपति का वंदन करता हूँ ।।
हों कामनाएँ पूरी मेरी विनती मन ही मन करता हूँ ।।
हिय से हो भाव विभोर तुम्हें शत-शत अभिनंदित करता हूँ ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
माँ की ममता का यह सागर मेरे दिल का उजियाला है ।।
असमर्थ हूँ यह कहने में इसे किस वात्सल्य से पाला है ?
निज उरउद्यान की नर्म कली कर कमल तुम्हारे धरता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
मम गृह जब यह बिटिया जन्मी तब वंशी तक ना बज पाई ।।
पर आज विदा के क्षण गूँजे मेरे घर आँगन शहनाई ।।
प्रकृति का कैसा अजब नियम लेकिन परिपालित करता हूँ ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
माँ भ्रातृ बहन मामा मामी यादों में इसकी खोएँगे ।।
बिछड़ी जाती आज अपनों से यह सोच सिसक सब रोएँगे ।। 
अपनी आँखों का नूर तुम्हें सौंप और प्रकाशित करता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
मम हृदय नील अकाश चंद्र सम चम चम सा यह तारा था ।।
मैं अब तक जान न पाया क्यों इस पर अधिकार तुम्हारा था ? 
मैं पित्र कहाने का अपना हक़ तुम्हें विसर्जित करता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता ह…