Posts

Showing posts from 2019

मादक , मसृण , मृदुल , महमहा

Image
मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
जैसी कल थी तू आकर्षक ।
उससे और अधिक अब हर्षक ।
तू सुंदर , अप्सरा , परी तू ।
उर्वशी , रंभा से भी खरी तू ।
मैं तेरे सम्मुख सच बंदर ।
किंतु मुझे तक उछल उछलकर ,
हाय लगा मत आज कहकहा ।।
मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
मैं भी गबरू था बाँका था ,
तब तेरा मेरा टाँका था ,
रोजी-रोटी की तलाश में ,
मैं बदला जिंदा सी लाश में ,
अब तू इक राजा की रानी ,
तू मदिरा सम मैं बस पानी ,
बरसों बाद मिली है चुप कर ,
देख मुझे मत आज चहचहा ।।
मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 927 - डोली

Image
माथे बीच लगी कालिख ,
छूने भर से अंधा बोले ,
मुझको तो यह हल्दी औ' 
चंदन की रोली लगती है ।।
चपटी से भी चपटी कोई 
ईंट बहुत ही दूरी से ,
तेज़ नज़र को भी शायद 
पूछो तो गोली लगती है ।।
अक़्ल ज़रा सी जिनको ऊपर 
वाले ने कुछ कम बख़्शी ;
आँखें दीं लेकिन उनमें ना 
देखने की कुछ दम बख़्शी ;
ऐसों को हैरत क्या कंधों 
पर चलने वाली अर्थी ,
यदि ख़ामोशी से बढ़ती 
दुल्हन की डोली लगती है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 926 - आँधी

Image
आज फिर याद की ऐसी आँधी चली ।। बुझ चुकी थी जो दिल में वो आतिश जली ।। मुद्दतों बाद फिर तुम जो आए नज़र , इश्क़ ने मुझ में फिर दी मचा खलबली ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 277 - औघड़दानी

Image
चलता है सैलाब लिए मौजों की रवानी माँगे है ।।
इक ऐसा दरिया है जो ख़ैरात में पानी माँगे है ।।
जंगल पर जंगल कटवाने-काटने वाला हैराँ हूँ ,
हाथ पसारे आज ख़ुदा से रुत मस्तानी माँगे है ।।
इश्क़-मोहब्बत से नफ़रत का रिश्ता रखने वाला क्यों ,
आज अकेले में रो-रो इक दिलबरजानी माँगे है ?
उसकी कोई बात सुनी ना जिसने सारी उम्र मगर ,
आज उसी से शख़्स वही उसकी ही कहानी माँगे है ।।
रोजी-रोटी के लाले जिसको वो कब सोना-चाँदी ,
वह ख़्वाबों में भी रब से बस दाना-पानी माँगे है ।।
हाय नज़र जिस ओर पड़े उस जानिब ज़ह्र दिखाई दे ,
बेशक़ अब दुनिया की फ़ज़ा बस औघड़दानी माँगे है।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 925 - क्यों ?

Image
इश्क़-मोहब्बत की बातें करने से वह क्यों बचता है ?
क्या अब तक नाबालिग़ है वह या फिर कोई बच्चा है ? 
नौजवान क्या बच्चे भी जिस दौर में इश्क़ हैं फ़रमाते ,
वह पट्ठा क्यों सिर्फ़ ज़ुह्द की भारी बातें करता है ?
( नाबालिग़ = अवयस्क , पट्ठा = जवान , ज़ुह्द = विरक्ति , इंद्रिय निग्रह )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 277 - रो रहे हैं

Image
आजकल हालात ऐसे हो रहे हैं , मस्ख़रे भी खूँ के आँसू रो रहे हैं ।। जागते रहिए ये कहने वाले प्रहरी , कुंभकरणी नींद में सब सो रहे हैं ।। लोग सच्चे , हाल बदतर देख सच का , झूठ ही बच्चों में अपने बो रहे हैं ।। खेलने की उम्र में कितने ही बच्चे , सर पे गारा , ईंट , पत्थर ढो रहे हैं ।। वो उन्हें पाने की ज़िद में अपना सब कुछ , धीरे-धीरे , धीरे-धीरे खो रहे हैं ।। भागते जाए हैं वो - वो हमसे कल तक , हमपे सौ जाँ से फ़िदा जो-जो रहे हैं ।। दाग़ पेशानी के झूठे-सच्चे सारे , जितना मुमकिन उतना रो-रो धो रहे हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 924 - इक रब मानते हैं

Image
मत हो हैराँ जान कर बेदिल ये सच है ,
एक बस हम ही नहीं सब मानते हैं ।।
जो भी सच्चा प्यार करते हैं जहाँ में ,
इश्क़ को ही ज़ात-ओ-मज़हब मानते हैं ।।
और तो और इश्क़ जब हद पार कर ले ,
माने आशिक़ को ख़ुदा महबूबा उसकी ;
और आशिक़ लोग महबूबा को अपनी ,
तह-ए-दिल से अपना इक रब मानते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 923 - मश्वरा

Image
लेकर मशाल रौशन करने न चल पड़ो तुम 
उसको जो कोयले की इक खान है ; सँभलना ।।
आँखों में नींद भर उस पर चल दिए हो सोने ,
बिस्तर सा वो नुकीली चट्टान है ; सँभलना ।।
अंदर है उसमें ज़िंदा ज्वालामुखी धधकता ,
लेकिन ज़ुबाँ से उसके ठंडा शहद टपकता ,
इक मश्वरा है उससे मत दोस्ती रखो सच ,
तुम झोंपड़ी हो वो इक तूफ़ान है ; सँभलना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


मुक्तक : 922 - नच रहा हूँ

Image
तुम मानों या न मानों 
यह कह मैं सच रहा हूँ ।।
बारिश में भीगने से 
हरगिज़ न बच रहा हूँ ।।
दरअस्ल मैं किसी को 
नीचे दरख़्त के रुक ,
चोरी से नचते तक दिल 
ही दिल में नच रहा हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 921 - गिर पड़ा हूँ

Image
हैरान हो रहे हो , मैं कल सा फिर पड़ा हूँ ? हँसते ही हँंसते कैसे , अश्क़ों से घिर पड़ा हूँ ?
मैं आज भी नशे में हूँ पर नहीं नशे से ,
ठोकर किसी के धोख़े की खा के गिर पड़ा हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 920 - चाहत

Image
तुम्हीं एक से जिस्म आहत कहाँ है ?
किसी से भी इस दिल को राहत कहाँ है ?
अगर ख़ुश नहीं हूँ तो ये मत समझना ,
अभी मुझमें हँसने की चाहत कहाँ है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 276 - जिद्दोजहद

Image
बड़ी जिद्दोजहद से , कशमकश से , ख़ूब मेहनत से ।। न हो हैराँ मोहब्बत की है मैंने घोर नफ़रत से ।। 1 ।। हूंँ जो आज इस मुक़ाँ पर तो बड़ी ही मुश्क़िलों से हूँ , न इत्मीनान से , आराम से , ना सिर्फ़ क़िस्मत से ।। 2 ।। यक़ीनन जंग लड़कर ही किया मैंने भी हक़ हासिल , मिला कब माँगने से , इल्तिजा से , सिर्फ़ चाहत से ।। 3 ।। न जब राज़ी हुए थे वो मेरी दरख्व़ास्त सुनने को , मैं चढ़ बैठा था नीचे कूदने ऊँची इमारत से ।। 4 ।। वहाँ सख्त़ी से , बेदर्दी से उसने दिल किये टुकड़े , यहाँ तोड़ा न मैंने पत्थरों को भी नज़ाकत से ।। 5 ।। ज़रूरी तो नहीं सूरत अमीराना हो जिसकी वो , हक़ीक़त में हो दौलतमंद , ना हो तंग ग़ुर्बत से ।। 6 ।। ( जिद्दोजहद = पराक्रम , कशमकश = असमंजस , इल्तिजा = निवेदन , ग़ुर्बत = कंगाली ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

महामुक्तक : 919 - परिवर्तन

Image
जो दिया करते थे सौग़ातों पे सौग़ातें , आज वो ही लूटने हमको मचलते हैं ।। जो हमारे सिर का सारा बोझ ढोते थे , अब वही पैरों तले हमको कुचलते हैं ।। जो लगे रहते थे सचमुच इक ज़माने में , हाँ ! मिटाकर ख़ुद को हमको बस बनाने में , करके वो नुक़्साँ हमारा , ढेर दे तक़्लीफ़ , भर ख़ुशी से आज बंदर सा उछलते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : अर्द्ध शतक

Image
हाय मंसूबा नहीं इक अब तलक पूरा हुआ ।।1।।
जबकि अपनी उम्र का आधा शतक पूरा हुआ ।।2।।
क्या नहीं हमने किया मंज़िल को पाने वास्ते ।
रौंद डाले काँटों , अंगारों भरे सब रास्ते ।
कुछ ने कम मेहनत में भी है पा लिया अपना मुक़ाम ।
कुछ ने बैठे - बैठे ही हथिया लिया अपना मुक़ाम ।।
और इक हम हैं कि जिनका बिन रुके लंबा सफ़र ,
धीरे - धीरे रेंग कर , ना चल लपक पूरा हुआ ।।3।।
हाय मंसूबा नहीं इक अब तलक पूरा हुआ ।।
जबकि अपनी उम्र का आधा शतक पूरा हुआ ।।
हमने जिस दिन से कफ़न को बेचना चालू किया ।
ठीक उसी दिन से सभी लोगों ने मरना तज दिया ।
हाथ उनके आइने अंधों को सारे बिक गए ।
और कंघे भी निपट गंजों को सारे बिक गए ।
ख़्वाब उनका सोते-सोते हो गया सच और इधर ,
आँख खोलेे ना सतत पलकें झपक पूरा हुआ ।।4।।
हाय मंसूबा नहीं इक अब तलक पूरा हुआ ।।
जबकि अपनी उम्र का आधा शतक पूरा हुआ ।।
जाने कैसी-कैसी तदबीरें लगाते हम रहे ।
हर तरह की सोच-तरकीबें लगाते हम रहे ।
काम से कब हमने जी अपना चुराया था मगर ।
बल्कि ख़ुद को डूब कर उसमें भुलाया था मगर ।
काम सब के नाचते-गाते हुए सब बन गए ,
अपना इक भी हँसते-हँसते ना फफक पूरा हुआ ।।5।।
हाय मंसूबा नहीं इक अब तलक पूरा हुआ ।।
जबकि…

मुक्तक : 918 - गुलगुला

Image
तीखा मौसम मालपुआ , गुलगुला हुआ है ।। धरती गीली श्याम गगन अब धुला हुआ है ।। हम इसके आनन्द में रम ये भूल गये कब , बरखा बंद हुई पर छाता खुला हुआ है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 917 - बिल

Image
जब कभी तू हर इक शख़्स का ख़्वाब थी , तू मेरा भी थी मक़्सद , थी मंज़िल कभी ।। आशिक़ों की तेरे जब बड़ी फ़ौज थी , उसमें चुपके से मैं भी था शामिल कभी ।। तू न माने ज़माने के आगे तो क्या , है हक़ीक़त मगर तुझको सारी पता , मेरे दिल में तेरी एक बड़ी माँद थी , तेरे दिल में था मेरा भी इक बिल कभी ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 916 - झक

Image
उनके लिए जो मारते हैं झक अभी भी हम ? समझे नहीं ये बात आज तक , अभी भी हम ।। उनको नहीं सुहाते फूटी आँख हम मगर ! उनको ही ताकते हैं एकटक अभी भी हम ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 915 - ग़ुस्सा

Image
रेलगाड़ी गुज़रे जर्जर पुल से ज्यों कोई ,
इस तरह दिल देख उसको धड़धड़ाता है ।।
तक मुझे ता'नाज़नी करता वो कुछ ऐसी ,
कान में पिघला हुआ ज्यों काँच जाता है ।।
मैं न ग़ुस्सेवर ज़रा पर पार कर जाए ,
देखकर उसको मेरा सात आस्माँ ग़ुस्सा ,
जोंक बनकर जिसने मेरी ज़िंदगी चूसी ,
उसका पी जाने को ख़ूँ मैं कसमसाता हूँ ।। 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 914 - मरीज़-ए-इश्क़

Image
मैंने माना मैं मरीज़-ए-इश्क़ तेरा ,  और तू मेरे लिए बीमार है , हाँ ।। दरमियाँ अपने मगर सदियों पुरानी ;  एक पक्की चीन की दीवार है , हाँ ।। इक बड़ा सा फ़र्क़ तेरी मेरी हस्ती ;  ज़ात , मज़हब , शख्स़ियत , औक़ात में है , यूँ समझ ले मैं हूँ इक अद्ना सी मंज़िल ;  तू फ़लकबोस इक कुतुबमीनार है , हाँ ।। ( दरमियाँ = मध्य , फ़लकबोस = गगनचुंबी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

तिरंगा

Image
बात करता है तिरंगे को जलाने की ।। कोशिशें करता है भारत को मिटाने की ।। ये सितारा-चाँद हरे रँग पर जड़े झण्डा , सोचता है बंद हवा में फरफराने की ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 913 - स्वप्न

Image
दादुर उछल शिखी को नचना सिखा रहा है ।। ज्ञानी को अज्ञ अपनी कविता लिखा रहा है ।। उठ बैठा चौंककर मैं जब स्वप्न में ये देखा , इक नेत्रहीन सुनयन को अँख दिखा रहा है ।। ( दादुर = मेंढक , शिखी = मोर , अज्ञ = मूर्ख ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 912 - तस्वीर

Image
धागा भी हो गया इक ज़ंजीर आज तो ।। काँटा भी लग रहा है शमशीर आज तो ।। कल तक की भीगी बिल्ली बन बैठी शेरनी , तब्दीलियों की देखो तस्वीर आज तो ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 911 - हुजूर

Image
सोचा नहीं था मुझसे मेरा हुजूर होगा ।। जितना क़रीब था वो उतना ही दूर होगा ।। मैं मानता कहाँ हूँ दस्तूर इस जहाँ का  , आया है जो भी उसको जाना ज़रूर होगा ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 910 - बारिश

Image
उनसे मिलकर हमको करना था बहुत कुछ रात भर ।।  कर सके लेकिन बहुत कुछ करने की हम बात भर ।। नाम पर बारिश के बदली बस टपक कर रह गयी , हमने भी कर उल्टा छाता उसमें ली बरसात भर ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 909 - बरसात

Image
उड़-दौड़-चलते-चलते थक स्यात् रुक गई है ।। हो-होके ज्यों झमाझम दिन-रात चुक गई है ।। छतरी न थी तो बरखा रह-रह बरस रही थी , छाता खरीदते ही बरसात रुक गई है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 908 - गर्मी की दोपहर

Image
लाकर कहीं से उनपे बादलों को छाऊँ मैं ।। 
भरभर हिमालयों से बर्फ जल चढ़ाऊँ मैं ।।
गर्मी की दोपहर के सूर्य से वो जल रहे ,
सोचूँ किसी भी तरह से उन्हें बुझाऊँ मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 907 - छाता

Image
आता हुआ मैं या फिर जाता ख़रीद लूँ ।। मन को हो नापसंद या भाता ख़रीद लूँ ।। लेकिन ये लाज़िमी है बाज़ार से कोई , बरसात आ रही इक छाता ख़रीद लूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 906 - पत्तल

Image
किस पाप की सख़्त सज़ा चुप ऐसे काट रहा है ?
इस क़दर है क्यों बेकस वो कभी जो लाट रहा है ?
हैराँ हूँ कई पेटों को पालने वाला वह क्यों ,
बिलबिला भूख से जूठी पत्तल चाट रहा है ?
( बेकस = असहाय , लाट = लार्ड शब्द का अपभ्रंश )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

सेल्फ़ी

Image
सब वफ़ादारी मेरी फिर आपकी , 
सिर्फ़ अपनापन ज़रा सा दीजिए ।।
ख़ूबसूरत मैं भी हूँ मुझ पर अगर , 
प्यार से अपनी नज़र इक कीजिए ।।
कुछ नहीं सचमुच नहीं कुछ आज बस , 
चाहता हूँ आप अपने हाथ से ,
सेल्फ़ी तो ख़ूब खींचीं आपने , 
इक मेरी तस्वीर भी ले लीजिए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 906 - बोलो न अहमक़

Image
जो बेमौत मारे गए या मरे ख़ुद , 
उन्हें तुम किसी हक़ से बोलो न अहमक़ !!
गर इतना जो हो जाता दुनिया में शायद , 
ज़मीं ही फिर हो जाती जन्नत बिलाशक़ !!
नदी-कूप पर होता प्यासों का क़ब्ज़ा , 
ग़रीबों , फ़क़ीरों का दौलत पे कुछ हक़ ,
जो होता ज़रूरी वो पास होता सबके ,
तो फिर ख़ुदकुशीे क्यों कोई करता नाहक़ ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 905 - तिरकिट

Image
तिरकिट-धा-तिनक-धिन-धिन 
तबला बजा बजाकर ।।
अख़बार सुर्ख़ियों की 
ख़बरें सुना सुनाकर ।।
लेकिन वो अपने दर्दो 
ग़म की कहानियों को ,
बेचे कभी न हरगिज़ 
आंँसू बहा बहा कर ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 904 - फाड़कर

Image
पथरीली सरज़मीं पर 
कर करके गहरे गड्ढे ,
फिर से न आएँ बाहर 
ऐसे मैं गाड़कर ।।
हरगिज़ न कोई दर्जी 
फिर से जो सिल सके ,
कुछ इस तरह के टुकड़े 
टुकड़ों में फाड़कर ।।
कुछ आपके वहाँ का , 
कुछ मेरे भी यहाँ का ,
जानूँ न कैसा-कैसा ,
जाने कहाँ-कहाँ का ?
आँखों से अपनी चुन-चुन 
देखो मैं बेच घोड़े ,
सपनों का सारा कचरा 
सोता हूँ झाड़ कर ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 903 - गैया

Image
अनुमान भी न तुम लगा सकोगे कि भैया ,
किस सोच में बैठा हूँ चराते हुए गैया ?
दिखता हूँ किनारे पे किंंतु हूँ मैं भँवर में , 
कैसे लगेगी पार मेरी कागज़ी नैया ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 992 - चकोरा

Image
कब मेरी जानिब वो शर्माकर बढ़ेंगे यार ?
जो मैं सुनना चाहूँ वो कब तक कहेंगे यार ?
ज्यों चकोरा चाँद को सब रात देखे है ,
इक नज़र भर भी मुझे वो कब तकेंगे यार ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 901- बैठ जाता हूँ

Image
मैं उनके सामने ख़ुद को गिराकर बैठ जाता हूँ ।।
उठे सर को सलीक़े से झुकाकर बैठ जाता हूँ ।।
मुझे सर पर बिठाने वो रहें तैयार लेकिन मैं ,
हमेशा उनके क़दमों में ही जाकर बैठ जाता हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 275 - गुलबदन

Image
काँटे न थे हमेशा से , थे इक चमन कभी ।।
पत्थर से जिस्म वाले हम , थे गुलबदन कभी ।।
महफ़िल में भी रहे हम आके यक़्कोतन्हा आज ,
जो अपने आप में थे एक अंजुमन कभी ।।
चंद हादसों ने सच में क्या से क्या बना दिया ,
जैसे हैं आज वैसे तो न थे अपन कभी ।।
मिट्टी के ढेले बन के रह गए हैं आजकल ,
आता नहीं यक़ीं कि सच थे हम रतन कभी ।।
बारिश के रूठने से बन के नाली रह गए ,
हम भी थे दसियों साल पहले तक जमन कभी ।।
पीरी में सारी शोख़ियों ने अलविदा कहा ,
जोबन में हम में भी ग़ज़ब था बाँकपन कभी ।।
( यक़्कोतन्हा = नितांत अकेला , जमन = यमुना नदी  , पीरी = वृद्धावस्था )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 900 - ग़म का छुपाना

Image
किसी गिर पड़े को झपट कर उठाना ।।
किसी ज़ख़्म खाए को मरहम लगाना ।।
ये आदत तुम्हारी नहीं ताज़ा-ताज़ा , 
है ये शौक तुममें निहायत पुराना ।।
हमें सब पता है कि क्या माज़रा है ,
कि क्या मग़्ज़े सर में क्या दिल में भरा है ?
तुम्हारा ये हर वक्त का मुस्कुराना ,
हमें सिर्फ़ लगता है ग़म का छुपाना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक

Image
सब्र से कुर्सी पे भी सच बैठते कब हैं ?
नींद भी लेते खड़े ही लेटते कब हैं ?
हर तरफ़ माहौल बेशक़ ख़ूबसूरत है ,
आँख रखकर भी मगर हम देखते कब हैं ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

अक़्ल

Image
हैं उसके अक़्ल वाले द्वार बंद देखिए ।।
लेकिन दयालुता भरी पसंद देखिए ।।
करता है आज कौन उल्लुओं से दोस्ती ,
भैंसों से प्यार करता अक़्लमंद देखिए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1718577278287991&id=100004072065187

पिताजी

Image
पाँव मुझ लँगड़े के दोनों , हाथ मुझ करहीन के ,
आँख मुझ अंधे की दो , बहरे के दोनों कान हैं ।।
यदि कोई मुझसे ये पूछे , हैं पिताजी क्या तेरे ?
झट से कह दूँगा नहीं कुछ किंतु मेरे प्रान हैं ।।
माँ की महिमा तो जगत में व्याप्त है आरंभ से ,
किंतु क्या माहात्म्य कम है मातृ सम्मुख पितृ का ?
यदि पिताजी पर कोई मुझसे कहे दो शब्द लिख ,
सच तुरत लेकर कलम लिख दूँगा मैं भगवान हैं ।।
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 899 - ग़ुस्सा

Image
मेरे ग़ुस्से को फूँक - फूँक मत हवा दे तू ।। मैं भड़क जाऊँ उससे पहले ही बुझा दे ।। मैं बरस उट्ठा तो दुनिया बहा के रख दूँगा , अब्र को मेरे नीला आसमाँ बना दे तू ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 898 - ज़ुर्म

Image
ज़ुर्म वो साज़िशन रोज़ करते रहे ।।
दूसरे उसका ज़ुर्माना भरते रहे ।।
ज़ख़्म तो फूल ही दे रहे थे मगर ,
सारा इल्ज़ाम काँटों पे धरते रहे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 897 - मैं कहाँ हूँ ?

Image
दिख रहा सबको वहीं बैठा जहाँ हूँ ।।
हूँ वहीं पर वाँ मगर सचमुच कहाँ हूँ ?
दिल मेरा आवारगी करता जिधर है ,
दरहक़ीक़त मैं यहाँ कब ? मैं वहाँ हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 896 - देखते हैं

Image
कि बेख़ौफ़ हो हम न डर देखते हैं ।। मचल कर तेरी रहगुज़र देखते हैं ।। तू दिख जाए खिड़की पे या अपने दर पर , तेरे घर को भर-भर नज़र देखते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 895 - मुस्कुराहट

Image
लोग कहते हैं मैं मुस्कुराता नहीं ।।
मैं ये कहता हूँ मैं कुछ छुपाता नहीं ।।
हर तरफ़ मुश्किलें , बंद राहें सभी ;
कौन ऐसे में फिर मुँह बनाता नहीं ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 894 - ख़्वाब

Image
नींद नहीं जब-जब आती 
तब-तब बस ऐसे सोता मैं ।।
लेटे-लेटे आँखें खोले 
सौ-सौ ख्व़ाब पिरोता मैं ।। 
भूले भटके सच हो जाएँ 
तो नच-नच पागल न बनूँ ,
चूर-चूर हो जाएँ तो भी 
ज़रा न रोता-धोता मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 274 - सिर पे आफ़्ताब

Image
न जब नशा मैं करूँ साथ क्यों शराब रखूँ ? 
लगे न प्यास तो हाथों में फिर क्यों आब रखूँ  ?
मैं सख़्त उम्मी हूँ दुनिया को यह पता है मगर ,
मैं अपने हाथों में हर वक़्त क्यों किताब रखूँ ?
मुझे पसंद है दिन में भी तीरगी ही वले ,
तो क्यों मैं रात उठा सिर पे आफ़्ताब रखूँ ?
मैं इक नज़ीर हूँ दुनिया में मुफ़्लिसी की बड़ी ,
मुझे क्या हक़ है कि आँखों में फिर भी ख़्वाब रखूँ ?
वो मुझको चाहे न चाहे ये उसकी मर्ज़ी अरे ,
मैं उसको कितना करूँ प्यार क्यों हिसाब रखूँ ?
वो मुझको क़तरा भी रखता नहीं है देने कभी ,
मैं उसको सौंपने हर वक़्त क्यों तलाब रख़ूँ ?
तरसता है वो मेरे मैं भी उसके दीद को फिर ,
मिले कहीं वो मैं चेहरे पे क्यों हिजाब रखूँ ?
[ आब = जल // उम्मी = अनपढ़ // तीरगी = अंधकार // 
वले = किंतु // आफ़्ताब = सूर्य // नज़ीर = उदाहरण // 
मुफ़्लिसी = ग़रीबी // क़तरा = बूँद // दीद = दर्शन // हिजाब = घूँघट ]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 893 - कोई देखे न.........

Image
जाने क्यों सिर पे लोहा उठा , जैसे फूलों को ढोता हूँ मैं ।। छटपटाऊँ न काँटों पे चल , बल्कि सच शाद होता हूँ मैं ।। तुम न मानोगे मैं बेतरह , कोई देखे न ऐसी जगह , आज भी उसकी यादों में इक, भूखे बच्चे सा रोता हूँ मैं ।।  ( शाद = प्रसन्न , बेतरह = अत्यधिक ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

चौकीदार

Image
उनके जिनके मंत्रियों से सीधे व्यवहार ।।
करते उनमें से कई चोरी-भ्रष्टाचार ।।
उस पर तुर्रा यह कि चढ़ मंचों पर बेशर्म ,
चिल्ला-चिल्ला बोलते हम हैं चौकीदार ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

कुल्फ़ी

Image
कभी चूसते रहे तो कभी काटते रहे ।।
दाँतों से बर्फ़-टुकड़ों को बाटते रहे ।।
गर्मीे में कैसे पाएँ ठंडक ये सोचकर ,
कुल्फ़ी को ले ज़ुबाँ पर हम चाटते रहे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति