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Sunday, April 21, 2019

मुक्त ग़ज़ल : 274 - सिर पे आफ़्ताब


न जब नशा मैं करूँ साथ क्यों शराब रखूँ ? 
लगे न प्यास तो हाथों में फिर क्यों आब रखूँ  ?
मैं सख़्त उम्मी हूँ दुनिया को यह पता है मगर ,
मैं अपने हाथों में हर वक़्त क्यों किताब रखूँ ?
मुझे पसंद है दिन में भी तीरगी ही वले ,
तो क्यों मैं रात उठा सिर पे आफ़्ताब रखूँ ?
मैं इक नज़ीर हूँ दुनिया में मुफ़्लिसी की बड़ी ,
मुझे क्या हक़ है कि आँखों में फिर भी ख़्वाब रखूँ ?
वो मुझको चाहे न चाहे ये उसकी मर्ज़ी अरे ,
मैं उसको कितना करूँ प्यार क्यों हिसाब रखूँ ?
वो मुझको क़तरा भी रखता नहीं है देने कभी ,
मैं उसको सौंपने हर वक़्त क्यों तलाब रख़ूँ ?
तरसता है वो मेरे मैं भी उसके दीद को फिर ,
मिले कहीं वो मैं चेहरे पे क्यों हिजाब रखूँ ?
[ आब = जल // उम्मी = अनपढ़ // तीरगी = अंधकार // 
वले = किंतु // आफ़्ताब = सूर्य // नज़ीर = उदाहरण // 
मुफ़्लिसी = ग़रीबी // क़तरा = बूँद // दीद = दर्शन // हिजाब = घूँघट ]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, April 14, 2019

मुक्त मुक्तक : 893 - कोई देखे न.........


जाने क्यों सिर पे लोहा उठा , जैसे फूलों को ढोता हूँ मैं ।।
छटपटाऊँ न काँटों पे चल , बल्कि सच शाद होता हूँ मैं ।।
तुम न मानोगे मैं बेतरह , कोई देखे न ऐसी जगह ,
आज भी उसकी यादों में इक, भूखे बच्चे सा रोता हूँ मैं ।। 
( शाद = प्रसन्न , बेतरह = अत्यधिक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, April 13, 2019

चौकीदार


उनके जिनके मंत्रियों से सीधे व्यवहार ।।
करते उनमें से कई चोरी-भ्रष्टाचार ।।
उस पर तुर्रा यह कि चढ़ मंचों पर बेशर्म ,
चिल्ला-चिल्ला बोलते हम हैं चौकीदार ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, April 11, 2019

कुल्फ़ी


कभी चूसते रहे तो कभी काटते रहे ।।
दाँतों से बर्फ़-टुकड़ों को बाटते रहे ।।
गर्मीे में कैसे पाएँ ठंडक ये सोचकर ,
कुल्फ़ी को ले ज़ुबाँ पर हम चाटते रहे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, April 7, 2019

मुक्त मुक्तक : 892 - मौत


हर जगह ही ज़िंदगी पर मौत भारी है ।।
ज़िंदगी भी मौत से हर बार हारी है ।।
फिर ज़माने में ज़माने से मैं हैराँ हूँ ,
ज़िंदगी और मौत की क्यों जंग जारी है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, March 25, 2019

मुक्त ग़ज़ल : 273 - त्योहार


परेशाँ करने वालों को न ख़िदमतगार कहिएगा ।।
बिठा पहरे पे चोरों को न चौकीदार कहिएगा ।।
वतन के वास्ते जो जाँ हथेली पर लिए घूमें ,
न हों फ़ौजी भी तो उनको सिपहसालार कहिएगा ।।
न चिनवाओ उन्हें ज़िंदा ही तुम दीवार में लेकिन ,
मसूदों को सरेआम एक सुर ग़द्दार कहिएगा ।।
जो बनकर बैल कोल्हू के लगे रहते हैं मेहनत में ,
कमाई की नज़र से मत उन्हें बेकार कहिएगा ।।
कभी भूले भी जो हटता नहीं उसके हसीं रुख़ से ,
उसे पर्दा न कहकर जेल की दीवार कहिएगा ।।
कोई पूछे कि अब हम क्यों न होंगे ठीक तो हमको 
बस उसके कान में जा इश्क़ का बीमार कहिएगा ।।
कहो मत ईद को ,क्रिसमस को ,दीवाली को ,होली को
ग़रीबी नाच उठे जिस दिन उसे त्योहार कहिएगा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, March 22, 2019

रँग डाला........


मैंने सत्य मानों प्रेमवश , 
बुरी तरह तुमको रँंग डाला ।।
सच बोलूँ मैं माथ शपथ धर , 
बुरी तरह उनको रँंग डाला ।।
किंतु हाय तुम दोनों ने मिल , 
इक प्रतिकार की भाँति पकड़ फिर ,
भाँति भाँति के वर्ण घोलकर , 
बुरी तरह मुझको रँग डाला ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, March 17, 2019

दोहा ग़ज़ल


वो जब अपने सामने , पड़ जाते हैं यार ।।
होश गवाँ करने लगें , हम उनके दीदार ।।
हँसते हैं जब वो यही , होता है महसूस ,
जैसे खनकें पायलें , कोयल गाए मल्हार ।।
जिनसे इश्क़ हक़ीक़तन , करते हम कमबख़्त ,
वो ग़ैरों के प्यार में , रहते हैं बीमार ।।
उनके हिज्र में रात यों , बरसी आँखें दोस्त ,
ज्यों सावन में भी नहीं , होती धारासार ।।
उनकी खुशियों का वहाँ , कोई ओर न छोर ,
अपने भी ग़म का न याँ , दिखता पारावार ।।
उनकी आँख में आज भी , हम कोल्हू के बैल ,
पहले भी बेकार थे , अब भी हैं बेकार ।।
वह जब तक अपना रहा , दुनिया लगी हबीब ,
वह जब ग़ैर हुआ हुआ , ज्यों बैरी संसार ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, March 10, 2019

मुक्त ग़ज़ल : 272 - मुक्का-लात



  किस मज्बूरी के चलते यह बात हुई है ?
  जो अंधों के आगे नचते रात हुई है ।।
  हैराँ हूँ सुनकर इक बुलबुल के हाथों कल ,
  अंबर में बाज़ों की भारी मात हुई है ।।
  झूठ है सिर्फ़ अमीर ही बख्श़िश दें जग में , क्या 
  मँगतों के हाथों न कभी ख़ैरात हुई है ?
  भूखे सिंह को ज्यों बकरी भी दिखती हिरनी ,
  उनकी आँखों में यूँ मेरी औक़ात हुई है ।।
  रेगिस्तान तरसते रोते याँ बदली को , 
  वाँ दिन-रात समंदर में बरसात हुई है ।।
  तुम क्या जानो हम क्यों रोज़ ज़हर पीते हैं ?
  हम ही जानें हमको मौत हयात हुई है ।।
  वे दोनों गाँधीवादी हैं पर उनमें भी ,
  मेरे आगे अक्सर मुक्का-लात हुई है !!
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, March 3, 2019

ग़ज़ल मुक्तक




बुलाके पास जो 
आवारा क़िस्म कुत्ते को ,
खिलाके बिस्कुट और 
सिर्फ़ एक हड्डे को ,
सुनाने बैठ गया 
अपनी अनसुनी ग़ज़लें ,
अदब से वो भी खड़ा 
हो गया था सुनने को ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, February 28, 2019

काग


  चोंच से खींचकर काग आँचल तेरा ।।
  बोले उससे भी काला है काजल तेरा ।।
  रंग पूनम से उजला , अमावस लटें ,
  मुख तो अमृत सा पर मन हलाहल तेरा ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, February 24, 2019

मुक्त ग़ज़ल : 271- कनीज़


मैं तो सिर्फ़ एक कनीज़ हूँ ।।
तुम्हें किस लिए फिर अज़ीज़ हूँ ?
हूँ खिलौना मुझसे लो खेल लो ,
कि मैं आदमी नहीं चीज़ हूँ ।।
मुझे तुम धुएँ में ले आए फिर ,
मैं दमा का जबकि मरीज़ हूँ ।।
मुझे मारने का है हुक़्म उसे ,
कि मैं जिसका जानी हफ़ीज़ हूँ !!
न छुपाए पुश्त न सीना ही ,
मैं वो तार - तार कमीज़ हूँ ।।
न निगाह देख के मैली कर -
मुझे मैं बहुत ही ग़लीज़ हूँ ।। 
न उठाके गोदी में ले मुझे ,
बड़ा भारी और दबीज़ हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, February 16, 2019

सिर काटेंगे




आकाश तड़ित सा लपक लपक दुश्मन पर गिर गिर काटेंगे ।।
यदि आज नहीं यदि अभी नहीं तो हम किस दिन फिर काटेंगे ?
अब आँख के बदले आँख नहीं ना हाथ हाथ के बदले में , 
अब तो अपनी इक उँगली भी कटती है हम सिर काटेंगे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, January 10, 2019

विवाह आभार पत्र

             
आपने करबद्ध हो हम को नमन शत-शत किया ।।
अपना नीलाकाश से भी उच्च मस्तक नत किया ।।
झुक गए प्रत्येक बाराती भी आगे आपके ,
आपने कुछ इस तरह उनका सुहृद् स्वागत किया ।।
कौन करता है किसी का आजकल अब इस तरह ।।
आपने सम्मान हमारा सच किया है जिस तरह ।।
सोचते हैं हम बहुत अभिभूत होकर आपका ,
यदि करें आभार का प्रकटीकरण तो किस तरह ?
                                             - वर का पिता
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

विवाह अभिनंदन पत्र



कर सरस्वती को नमन प्रथम गणपति का वंदन करता हूँ ।।
हों कामनाएँ पूरी मेरी विनती मन ही मन करता हूँ ।।
हिय से हो भाव विभोर तुम्हें शत-शत अभिनंदित करता हूँ ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
माँ की ममता का यह सागर मेरे दिल का उजियाला है ।।
असमर्थ हूँ यह कहने में इसे किस वात्सल्य से पाला है ?
निज उरउद्यान की नर्म कली कर कमल तुम्हारे धरता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
मम गृह जब यह बिटिया जन्मी तब वंशी तक ना बज पाई ।।
पर आज विदा के क्षण गूँजे मेरे घर आँगन शहनाई ।।
प्रकृति का कैसा अजब नियम लेकिन परिपालित करता हूँ ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
माँ भ्रातृ बहन मामा मामी यादों में इसकी खोएँगे ।।
बिछड़ी जाती आज अपनों से यह सोच सिसक सब रोएँगे ।। 
अपनी आँखों का नूर तुम्हें सौंप और प्रकाशित करता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
मम हृदय नील अकाश चंद्र सम चम चम सा यह तारा था ।।
मैं अब तक जान न पाया क्यों इस पर अधिकार तुम्हारा था ? 
मैं पित्र कहाने का अपना हक़ तुम्हें विसर्जित करता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
नवगृह पढ़ना जा रामायण संविधान और भगवद् गीता ।। 
चलना उस पथ जिस राह चलीं सावित्री,अनुसुइया , सीता ।। 
इसका हो अटल सुहाग दुआ प्रभु से ये निवेदित करता हूँ  ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।। 
-एक पुत्री का पिता
- डॉ. हीरालाल प्रजापति