मुक्त मुक्तक : 889 - आश्रित



पेट जो परिवार का ही पालने में मर गया ।।
शुष्क आँखों के मरुस्थल आँसुओं से भर गया ।।
अपने पालक का मरण यूँ देख उसका आश्रित आह , 
लोग डरते मृत्यु से वह ज़िंदगी से डर गया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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