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Showing posts from December, 2018

नववर्ष

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मरने पे या किसी के जन्मने पे नचेंगे ।।
जानूँ न क्यों वलेक लोग बाग जगेंगे ।।
तुम भी तमाशा देखने को रात न सोना ।।
मरने पे मेरे थोड़ा भी मायूस न होना ।।
31 दिसंबर मैं चीख़ दे ख़बर रहा ।।
01 जनवरी को जन्मा मैं नववर्ष मर रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 891 - दुशाला

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चहुँदिस स्वयं को मैंने जिससे लपेट डाला ।। ऊनी नहीं न है वो मृत वन्य मृग की छाला ।। चलते हैं शीत लहरों के तीर जब बदन पे , बन ढाल प्राण रक्षा करता यही दुशाला ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 270 - फ़ित्रत

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हमने अजीब ही कुछ फ़ित्रत है पायी यारों ।।
हर बात धीरे-धीरे-धीरे ही भायी यारों ।।
उस तक पलक झपकते हम मीलों दूर पहुँचे ,
वह दो क़दम भी हम तक बरसों न आयी यारों ।।
उसको तो मौत ने भी ख़ुशियाँ ही ला के बाँटीं ,
हमको तो ज़िंदगी भी बस ग़म ही लायी यारों ।। 
भूखे रहे मगर हम इतना सुकूँ है हमने ,
औरों की छीनकर इक रोटी न खायी यारों ।।
बदली समंदरों पर जाकर बरसने वाली ,
हैराँ हूँ आज रेगिस्तानों पे छायी यारों ।।
ख़ुश हूँ कि ग़ुस्लख़ाने में आज उसने मेरी ,
दिल से ग़ज़ल तरन्नुम में गुनगुनायी यारों ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 890 - तस्वीर

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फूलों सी खिलखिलाती , तारों सी झिलमिलाती ।।
आँखों को हर किसी की बेसाख़्ता लुभाती ।।
वो जिनकी ज़िंदगी को ग़म ने जकड़ रखा है ,
तस्वीर उनकी अक्सर होती है मुस्कुराती ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 889 - आश्रित

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पेट जो परिवार का ही पालने में मर गया ।।
शुष्क आँखों के मरुस्थल आँसुओं से भर गया ।।
अपने पालक का मरण यूँ देख उसका आश्रित आह , 
लोग डरते मृत्यु से वह ज़िंदगी से डर गया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति