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कविता : नास्तिकता क्यों ?

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धर्मभीरु भर घृणा से करते हैं आपस में बत ।
धर्म से च्युत ईश्वर से सर्वथा हूँँ मैं विरत ।। 
पूछते रहते हैं मैं क्यों नास्तिक हूँँ तो सुनो ।
पूर्णत: ध्यानस्थ होकर तथ्यत: सर्वस गुनो ।। 
किंतु यह भी जान लो मैं यह कभी कहता नहीं ।
वह जिसे भगवान कहते सब जगह रहता नहीं ।।
पूर्णत: आश्वस्त हो निज सत्य को मैं धर रहा ।
सर्वथा है व्यक्तिगत अभिव्यक्त जो मैं कर रहा ।।
यह मेरी और उस ख़ुदा की शत्रुता का रूप है ।
जिसने मरुथल में मुझे जो धूप पर दी धूप है ।।
लोग कहते हैं कि उसके हाथ में हर बात है ।
वह जो चाहे सब छुड़ाले या वरे सौग़ात है ।।
वह असंभव को भी संभव चुटकियों में कर धरे ।
वह निपूतों की भी गोदी बाल बच्चों से भरे ।।
सच कहूँँ गुड़िया से भी प्यारी महज औलाद इक ।
हमने भी पाई थी कितनी मन्नतों के बाद इक ।।
यूँँ लगा जैसे मरुस्थल में हुई गंगा प्रकट ।
मिल गई अंधों को आँँखें भिक्षुओं को स्वर्णघट ।।
शुक्रिया रब का कभी करना ना हम भूले मगर ।
हो गया इक दिन ख़फ़ा जाने न वो किस बात पर ।।
सच कहूँँ सच्चाई से भी अत्यधिक सच्ची मेरी ।
अल्पवय में ही अचानक पुष्प सी बच्ची मेरी ।।
खेलते ही खेलते इक दिन अचानक यों गिरी ।
लाइलाज ऐसे भयानक रोग से वह जा घि…