मुक्त ग़ज़ल : 269 - आसव


   शुद्ध गंगाजल से आसव हो गया हूँ ।।
   शिव था बिन तेरे पुरा-शव हो गया हूँ ।।
   बुलबुलों से कोयलों से भी मधुर मैं ,
   तुम नहीं तो मूक-नीरव हो गया हूँ ।।
   जानता हूँ  तुम नहीं होओगे मेरे ,
   क्या करूँ हृद-आत्म से तव हो गया हूँ ?
   तुम रहे जैसे थे वैसे ही तो मैं भी ,
   कौन सा प्राचीन से नव हो गया हूँ ?
   शक्य शेरों को भी मैं पहले नहीं था ,
   अब श्रृगालों को भी संभव हो गया हूँ !! 
   जैसे बिन राधा हुए थे कृष्ण , तुम बिन 
   मैं भी त्यों सियहीन राघव हो गया हूँ ।।
   ( आसव = शराब , पुरा-शव = पुरानी लाश , मूक = चुप , नीरव = बिना शब्द का , तव = तुम्हारा , शक्य = संभव , श्रृगाल = गीदड़ ,       राघव = श्रीराम )
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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