Friday, September 21, 2018

मुक्त मुक्तक : 887 - धृतराष्ट्र



  बैठे-ठाले मन रंजन को 
  अपना धंधा बोल न तू ।।
  बोगनविलिया के फूलों को 
  रजनीगंधा बोल न तू ।।
  जिनके मन के दृग हों फूटे ,
  उनको कह धृतराष्ट्र बुला ,
  किंतु कभी बस चर्म के चक्षु-
  विहीन को अंधा बोल न तू ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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मुक्तक : 583 - हे शिव जो जग में है

हे शिव जो जग में है अशिव तुरत निवार दो ।। परिव्याप्त मलिन तत्व गंग से निखार दो ।। स्वर्गिक बना दो पूर्वकाल सी धरा पुनः , या खो...