मुक्त मुक्तक : 887 - धृतराष्ट्र



  बैठे ठाले मनोरंजन को 
  अपना धंधा बोल न तू ।।
  बोगनविलिया के फूलों को 
  रजनीगंधा बोल न तू ।।
  जिनके मन के दृग हों फूटे ,
  उनको कह धृतराष्ट्र बुला ,
  किंतु कभी बस चर्मचक्षु-
  हीनों को अंधा बोल न तू ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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