मुक्त ग़ज़ल : 268 - मेहँदियाँ


    मुझसे तुम दो ही पल भर सटी रह गयीं ।। 
    सारी दुनिया की आँखें फटी रह गयीं ।। 
    मैं गुटक कर ख़ुशी कद्दू होता गया , 
    तुम चबा फ़िक्र को बरबटी रह गयीं ।। 
    चाहकर बन सका मैं न सर्कस का नट ,
    तुम नहीं चाह कर भी नटी रह गयीं ।। 
    और सब कुछ गया भूल मैं अटपटी ,
    चंद बातें तुम्हारी रटी रह गयीं ।।
    इक भी दुश्मन न अपना बचा जंग में ,
    इस दफ़ा लाशें बस सरकटी रह गयीं ।।
    तेरे हाथों में लगने की ज़िद पर अड़ी , 
    मेहँंदियाँ कितनी ही बस बटी रह गयीं ।।
              -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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