मुक्त ग़ज़ल : 266 - ढोल बजाकर



आँसू उनकी आंँखों का चश्मा है गहना है ।।
जिन लोगों का काम ही रोना रोते रहना है ।।
झूठ है रोने से होते हैं ग़म कम या फिर ख़त्म ,
ताल ठोंंक कर ,ढोल बजाकर सच ये कहना है ।।
ख़ुशियों का ही जश्न मनाया जाता महफ़िल में ,
दर्द तो जिसका है उसको ही तनहा सहना है ।।
क्या मतलब मज़्बूती छत दीवार को देने का ,
आख़िर बेबुनियाद घरों को जल्द ही ढहना है। ।। 
ज्यों ताउम्र हिमालय का है काम खड़े रहना ,
यूँँ ही गंगा का मरते दम तक बस बहना है ।।
क्यों नज़रें ना गाड़ें तेरे तन पर अंधे भी ,
क्यों तूने बारिश में झीना जामा पहना है ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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