मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म



   जब ज़ियादा मिल रहा क्यों कम मैं रख लूँँ ?
   है मयस्सर जब मज़ा क्यों ग़म में मैं रख लूँँ ?
   इक न इक दिन ज़ख्म तो वह देंगे आख़िर ,
   क्यों न लेकर आज ही मरहम मैं रख लूँँ ?
   इस क़दर प्यासी है सोचूँ इस नदी के
   वास्ते बारिश के कुछ मौसम मैं रख लूँँ !!
   उसकी क़िस्मत में नहीं का'बा पहुँँचना ,
   क्यों ना क़त्रा भर उसे ज़मज़म मैं रख लूँँ ?
   बस शराफ़त से बसर दुनिया में मुश्किल ,
   क्यों न ख़ुद में थोड़े पेचोख़म मैं रख लूँँ ?
   दुश्मनों के बीच रहने जा रहा हूँँ ,
   क्या छुरे-चाकू व गोले-बम मैं रख लूँँ ?
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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