मुक्त-ग़ज़ल : 263 - रागा करें



   एक भी दिन का कभी हरगिज़ न हम नागा करें ।।
   एक उल्लू और इक हम रात भर जागा करें ।।
   उनपे हम दिन रात बरसाते रहें चुन-चुन के फूल ,
   हमपे वो गोले दनादन आग के दागा करें ।।
   जो हमारे कान के पर्दों को रख दे फाड़कर ,
   ऐसे सच से बचके कोसों दूर हम भागा करें ।।
   किस लिए तुम पूछते हो और हम बतलाएँँ क्यों ,
   उनके हम क्या हैं हमारे कौन वो लागा करें ?
   लोग धागे से यहाँँ हम लोहे की ज़ंजीर से ,
   खुल न जाएँँ कस के ऐसे ज़ख़्म को तागा करें ।।
   वो नहीं अच्छे मगर हैं ख़ूबसूरत इस क़दर ,
   हम तो क्या दुश्मन भी उनके उनसे बस रागा करें ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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