मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा


   
   उसको रोने का यक़ीनन हर सबब पुख़्ता मिला ।।
   फिर भी वह हर वक्त लोगों को फ़क़त हंँसता मिला ।।
   मंज़िलों पर लोग सब आराम फ़रमाते मिले ,
   वह वहाँँ भी कुछ न कुछ सच कुछ न कुछ करता मिला ।।
   सब उछलते-कूदते जब देखो तब चलते मिले ,
   वह हमेशा ही समुंदर की तरह ठहरा मिला ।।
   " मैं तो खुश हूं सच बहुत खुश आंँख तो यूँँ ही बहे ,
   अपने हर पुर्साने ग़म से वह यही कहता मिला ।।
   अपने ज़ालिम बेवफ़ा महबूब के भी वास्ते ,
   हर जगह पागल सरीखा वह दुआ करता मिला ।।
   हर कोई इक दूसरे को कर रहा नंगा जहाँँ ,
   वह वहाँँ उघड़े हुओं पर कुछ न कुछ ढँकता मिला ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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