मुक्त-ग़ज़ल : 258 - फूल.....


देते हैं ज़ख़्म पत्थर को भी यहाँँ के फूल ।।
देती पहाड़ को भी टक्कर इधर की धूल ।।
हेठी क्या इसमें ख़ुद बढ़ हाथी सुलह करे ,
चींटी से दुश्मनी को देना न ठीक तूल ।।
सर सर के बदले टांँगों के बदले सिर्फ टाँँग ,
इंसाफ़ का मुझे यह लगता सही उसूल ।।
सोने की चौखटों में कस कस भी कीजै नज़्र ,
तब भी रहेंगे अंधों को आइने फ़ुज़ूल ।।
पाए हैं उस जगह से सचमुच ही उसने आम ,
बोए थे जिस जगह पर उसने कभी बबूल ।।
करते ज़रूर हैं वो मंज़ूर करना इश्क़ ,
लेकिन निकाह करना करते नहीं क़ुबूल ।।
क्या हो गया गुनह पर अब वो करें गुनाह ,
करते नहीं थे भूले से भी कभी जो भूल ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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