Saturday, June 23, 2018

ग़ज़ल : 258 - फूल.....


देते हैं ज़ख़्म पत्थर को भी यहाँँ के फूल ।।
देती पहाड़ को भी टक्कर इधर की धूल ।।1।।
हेठी क्या इसमें ख़ुद बढ़ हाथी जो करले सुल्ह ,
चींटी से दुश्मनी को देना न ठीक तूल ।।2।।
सर , सर के बदले , टांँगों के बदले सिर्फ टाँँग ,
इंसाफ़ का मुझे यह लगता सही उसूल ।।3।।
सोने की चौखटों में कस-कस भी कीजै नज़्र ,
तब भी रहेंगे अंधों को आइने फ़ुज़ूल ।।4।।
पाए हैं उस जगह से सचमुच ही उसने आम ,
बोए थे जिस जगह पर उसने कभी बबूल ।।5।।
करते ज़रूर हैं वो मंज़ूर करना इश्क़ ,
लेकिन निकाह करना करते नहीं क़बूल ।।6।।
क्या हो गया गुनह पर अब वो करें गुनाह ,
करते नहीं थे भूले से भी कभी जो भूल ?7।।
( सुल्ह = सुलह , संधि , मेल / नज़्र = भेंट / फ़ुज़ूल = व्यर्थ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

No comments:

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...