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Thursday, June 21, 2018

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......


  बन सका चिकना न सब कुछ खुरदरा बनवा लिया ।।
  सबने मीनार हमने बौना चौतरा बनवा लिया ।।
  जब बना पाए न हम अपना मकाँ तो जीते जी ,
  क़ब्र खुदवा अपनी अपना मक़्बरा बनवा लिया ।।
  ज़ुर्म क्या गर अपनी बेख़बरी में अपने घर ही पर ,
  अपने बावर्ची से हलवा चरपरा बनवा लिया ।।
  उन से खिंच कर उनकी हद में जा न पहुंँचेंं सोचकर ,
  हमने अपने आसपास इक दायरा बनवा लिया ।।
  प्यास को अपनी बुझाने घर न गंगा ला सके ,
  इसलिए आंँगन में छोटा पोखरा बनवा लिया ।।
  हुक़्म के उसके ग़ुलाम हम इस क़दर थे इक दफ़ा,
  उसने दी चोली तो हमने घाघरा बनवा लिया ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति
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