मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल



ना दोस्ती न रिश्तेदारी न प्यार है ।।
दुनिया में सबसे बढ़कर बस रोज़गार है ।।
मंज़िल पे हमसे पहले पहुंँचे न क्यों वो फिर ,
हम पर न साइकिल भी उस पर जो कार है ।।
सामाँँ है जिसपे ऐशो-आराम के सभी ,
है फूल उसी को जीवन बाक़ी को भार है ।।
बारूद के धमाके सा दे सुनाई क्यों ,
जब-जब भी उसके दिल में बजता सितार है ?
हर वक्त रोशनी का है इंतिज़ाम यूंँ ,
रातों को भी वहांँ पर लगता नहार है ।।
उतना है वह परेशाँँ , उतना ही ग़मज़दा ,
इस दौर में जो जितना ईमानदार है ।।
( नहार = दिन , दिवस )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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