मुक्त ग़ज़ल : 255 - वो मेरा है.......



बड़ी जिद्दोजहद से , कशमकश से , सख्त़ मेहनत से ।।
मोहब्बत मैंने की दुश्मन से अपने घोर नफ़रत से ।।
न भूले भी पड़ा क्यों इश्क़ के पचड़ों - झमेलों में ?
बचाए ख़ुद को रखने ही ज़माने भर की आफ़त से ।।
वो मेरा है ; मगर अच्छा नहीं , कब तक रहूंँ मैं चुप ?
बहुत मज़्बूर हूँ इस अपनी सच कहने की आदत से ।।
न रोऊँ मैं अजब है अपनी बर्बादी पे हांँ लेकिन ,
मैं जल उठता हूंँ झट काफ़ूर सा औरों की बरकत से ।।
मेरा सर काट के फ़ुटबॉल ही उसकी बना लो तुम ,
रहम करके न खेलो राह चलते मेरी अस्मत से ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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