Sunday, June 3, 2018

ग़ज़ल : 254 - चोरी चोरी



उसको चोरी चोरी छुप कर देखना भाता नहीं है ।।
क्या करूँ वह सामने खुलकर मेरे आता नहीं है ?
लोग सब दहशतज़दा हों देखकर मुझको मगर क्यों ,
धमकियों से भी वो मेरी टुक भी घबराता नहीं है ?
फाँसियों पर टाँगने वाला ज़रा सी भूल पर वो ,
क्यों गुनाहों पर भी मेरे मुझको मरवाता नहीं है ?
क्यों दुआएखै़र मेरे वास्ते करता फिरे वो ?
और क्यों....पूछूंँ तो अपना नाम बतलाता नहीं है ?
नाम पर नुक्स़ाँ के उमरा सर उठाते आस्मांँ को ,
लाल गुदड़ी का वो लुटपिट कर भी चिल्लाता नहीं है ।।
( दुआएख़ैर = कुशलता की कामना ,नुक़्साँ = घाटा , उमरा = अमीर लोग )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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