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Showing posts from June, 2018

मुक्त-ग़ज़ल : 261 - ग़ज़लें

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नंगे पांँवों जब काँटों पर चलना आता था ।।
तब मुझ को तक़्लीफ़ में भी बस हंँसना आता था ।।
उसके ग़म में सच कहता हूंँ हो जाता पागल ,
मेरी क़िस्मत मुझको ग़ज़लें कहना आता था ।।
उसने मुंँह से कब कुछ बोला रब का शुक्र करो ,
मुझ को बचपन से आंँखों को पढ़ना आता था ।।
उसकी जाने कैसी-कैसी पोलें खुल जातीं ,
वो तो राज़ मुझे सीने में रखना आता था ।।
वह तन कर ही रहता था तो कट बैठा जल्दी ,
मैं हूंँ सलामत मुझको थोड़ा झुकना आता था ।।
इंसाँँ हूंँ यह सोच किसी को फुफकारा भी कब ,
वरना मुझ को भी सांँपों सा डसना आता था ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 260 - कैसे-कैसे लोग

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कैसे-कैसे लोग दुनिया में पड़े हैं ।।
   सोचते पाँवों से सिर के बल खड़े हैं ।।
   आइनों के वास्ते अंधे यहाँँ , वाँ
   गंजे कंघों की खरीदी को अड़े हैं ।।
   जिस्म पर खूब इत्र मलकर चलने वाले ,
   कुछ सड़े अंडों से भी ज्यादा सड़े हैं ।।
   बस तभी तक जिंदगी ख़ुशबू की समझो ,
   जब तलक गहराई में मुर्दे गड़े हैं ।।
   देखने में ख़ूबसूरत इस जहाँँ के ,
   आदमी कुछ बेतरह चिकने घड़े हैं ।।
   सिर न जब तक कट गिरा हम दम से पूरे ,
   ज़िंदगी से जंग रोज़ाना लड़े हैं ।।
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 259 - पापड़

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जिस्म धन-दौलत सा जोड़ा जा रहा है ।।
   और दिल पापड़ सा तोड़ा जा रहा है ।।
   दौड़ता है पीछे-पीछे मेरा कछुआ ,
   आगे-आगे उनका घोड़ा जा रहा है ।।
   पहले ख़ुद डाला गया उस रास्ते पर ,
   अब उसी से मुझको मोड़ा जा रहा है ।।
   तोड़कर फिर काटकर हम नीबुओं को ,
   मीठे गन्ने सा निचोड़ा जा रहा है ।।
   उनका ग़म अब धीरे-धीरे , धीरे-धीरे ,
   थोड़ा-थोड़ा , थोड़ा-थोड़ा जा रहा है ।।
   वो हुए नाकाम अपनी वज्ह से ही ,
   ठीकरा औरों पे फोड़ा जा रहा है ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 258 - फूल.....

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देते हैं ज़ख़्म पत्थर को भी यहाँँ के फूल ।।
देती पहाड़ को भी टक्कर इधर की धूल ।।
हेठी क्या इसमें ख़ुद बढ़ हाथी सुलह करे ,
चींटी से दुश्मनी को देना न ठीक तूल ।।
सर सर के बदले टांँगों के बदले सिर्फ टाँँग ,
इंसाफ़ का मुझे यह लगता सही उसूल ।।
सोने की चौखटों में कस कस भी कीजै नज़्र ,
तब भी रहेंगे अंधों को आइने फ़ुज़ूल ।।
पाए हैं उस जगह से सचमुच ही उसने आम ,
बोए थे जिस जगह पर उसने कभी बबूल ।।
करते ज़रूर हैं वो मंज़ूर करना इश्क़ ,
लेकिन निकाह करना करते नहीं क़ुबूल ।।
क्या हो गया गुनह पर अब वो करें गुनाह ,
करते नहीं थे भूले से भी कभी जो भूल ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......

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बन सका चिकना न सब कुछ खुरदरा बनवा लिया ।।
  सबने मीनार हमने बौना चौतरा बनवा लिया ।।
  जब बना पाए न हम अपना मकाँ तो जीते जी ,
  क़ब्र खुदवा अपनी अपना मक़्बरा बनवा लिया ।।
  ज़ुर्म क्या गर अपनी बेख़बरी में अपने घर ही पर ,
  अपने बावर्ची से हलवा चरपरा बनवा लिया ।।
  उन से खिंच कर उनकी हद में जा न पहुंँचेंं सोचकर ,
  हमने अपने आसपास इक दायरा बनवा लिया ।।
  प्यास को अपनी बुझाने घर न गंगा ला सके ,
  इसलिए आंँगन में छोटा पोखरा बनवा लिया ।।
  हुक़्म के उसके ग़ुलाम हम इस क़दर थे इक दफ़ा,
  उसने दी चोली तो हमने घाघरा बनवा लिया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल

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ना दोस्ती न रिश्तेदारी न प्यार है ।। दुनिया में सबसे बढ़कर बस रोज़गार है ।। मंज़िल पे हमसे पहले पहुंँचे न क्यों वो फिर , हम पर न साइकिल भी उस पर जो कार है ।। सामाँँ है जिसपे ऐशो-आराम के सभी , है फूल उसी को जीवन बाक़ी को भार है ।। बारूद के धमाके सा दे सुनाई क्यों , जब-जब भी उसके दिल में बजता सितार है ? हर वक्त रोशनी का है इंतिज़ाम यूंँ , रातों को भी वहांँ पर लगता नहार है ।। उतना है वह परेशाँँ , उतना ही ग़मज़दा , इस दौर में जो जितना ईमानदार है ।।
( नहार = दिन , दिवस ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 255 - वो मेरा है.......

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बड़ी जिद्दोजहद से , कशमकश से , सख्त़ मेहनत से ।। मोहब्बत मैंने की दुश्मन से अपने घोर नफ़रत से ।। न भूले भी पड़ा क्यों इश्क़ के पचड़ों - झमेलों में ? बचाए ख़ुद को रखने ही ज़माने भर की आफ़त से ।। वो मेरा है ; मगर अच्छा नहीं , कब तक रहूंँ मैं चुप ? बहुत मज़्बूर हूँ इस अपनी सच कहने की आदत से ।। न रोऊँ मैं अजब है अपनी बर्बादी पे हांँ लेकिन , मैं जल उठता हूंँ झट काफ़ूर सा औरों की बरकत से ।। मेरा सर काट के फ़ुटबॉल ही उसकी बना लो तुम , रहम करके न खेलो राह चलते मेरी अस्मत से ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 886 - रिक्शे सी ज़िन्दगी......

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अजगर जहाँ में मैं भी अब बन गरुड़ रहा हूँ ।। मंज़िल पे रख निगाहें कहीं पर न मुड़ रहा हूँ ।। रिक्शे सी ज़िन्दगी को कर दूँ मैं कार  कैसे ? ये सोच सोच पंखों के बिन ही उड़ रहा हूँ ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़जल : 254 - चोरी चोरी

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उसको चोरी चोरी छुप कर देखना भाता नहीं है ।। क्या करूँ वह सामने खुलकर मेरे आता नहीं है ? लोग सब दहशतज़दा तकते ही हों मुझको मगर क्यों , धमकियों से भी वो मेरी टुक भी घबराता नहीं है ? फाँसियों पर टाँगने वाला ज़रा सी भूल पर वो , क्यों गुनाहों पर भी मेरे मुझको मरवाता नहीं है ? क्यों दुआएखै़र मेरे वास्ते करता फिरे वो ? और क्यों....पूछूंँ तो अपना नाम बतलाता नहीं है ? नाम पर नुक्स़ाँ के उमरा सर उठाते आस्मांँ को , लाल गुदड़ी का वो लुटपिट कर भी चिल्लाता नहीं है ।। ( दुआएख़ैर = कुशलता की कामना ,नुक़्साँ = घाटा , उमरा = अमीर लोग ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति