Saturday, April 28, 2018

मुक्त मुक्तक : 885 - सूखा तालाब



कैसा ये अजीबोग़रीब मेरा जहाँ है ?
बरसात के मौसम में भी तो सूखा यहाँ है !!
सोना न , न चाँदी , न हीरे-मोती समझना 
तालाब में ढूँढूँ मैं अपने पानी कहाँ है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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मुक्तक : 583 - हे शिव जो जग में है

हे शिव जो जग में है अशिव तुरत निवार दो ।। परिव्याप्त मलिन तत्व गंग से निखार दो ।। स्वर्गिक बना दो पूर्वकाल सी धरा पुनः , या खो...