मुक्त मुक्तक : 885 - सूखा तालाब


कैसा ये अजीबोग़रीब मेरा जहाँ है ?
मौसम में बारिशों के भी सूखा ही यहाँ है !!
सोना न चाँदी , हीरे न मोती समझना तुम 
तालाब में यूँ अपने ढूँढूँ पानी कहाँ है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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