मुक्त ग़ज़ल : 253 - दामाद




ग़मज़दा लोगों को क्यों मैं याद रहता हूँ ?
दर्द में भी जो ख़शी सा शाद रहता हूँ !!
अपने सीने में जकड़ लो बाँध लो कसके ,
ऐसी ही क़ैदों में मैं आज़ाद रहता हूँ !!
उसके क़ब्ज़े में मैं उसकी ज़िद की ख़ातिर सच ,
बाप होकर उसका बन औलाद रहता हूँ !!
शह्र की उजड़ी हुई हालत पे मत जाओ ,
अब भी मैं तब सा यहाँ आबाद रहता हूँ !!
जाने क्यों उसकी ख़ुदी के इक सुकूँ भर को ,
होके अव्वल भी मैं उसके बाद रहता हूँ !!
वक्त देखो जो मुझे दुत्कारते आए ,
बनके उनका ही मैं अब दामाद रहता हूँ !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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