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Showing posts from April, 2018

मुक्त मुक्तक : 885 - सूखा तालाब

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कैसा ये अजीबोग़रीब मेरा जहाँ है ? बरसात के मौसम में भी तो सूखा यहाँ है !! सोना न , न चाँदी , न हीरे-मोती समझना  तालाब में ढूँढूँ मैं अपने पानी कहाँ है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 253 - दामाद

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ग़मज़दा लोगों को क्यों मैं याद रहता हूँ ? दर्द में भी जो मज़ा सा शाद रहता हूँ !! अपने सीने में जकड़ लो बाँध लो कसके , ऐसी ही क़ैदों में मैं आज़ाद रहता हूँ !! उसके क़ब्ज़े में मैं उसकी ज़िद की ख़ातिर सच , बाप होकर उसकी बन औलाद रहता हूँ !! शह्र की उजड़ी हुई हालत पे मत जाओ , अब भी मैं तब सा यहाँ आबाद रहता हूँ !! जाने क्यों उसकी ख़ुदी के इक सुकूँ भर को , होके अव्वल भी मैं उसके बाद रहता हूँ !! वक़्त देखो जो मुझे दुत्कारते आए , बनके उनका ही मैं अब दामाद रहता हूँ !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति