Tuesday, March 13, 2018

मुक्त मुक्तक : 880 - एक कोंपल........



एक कोंपल था पका पत्ता न था ,
शाख से अपनी वो फिर क्यों झर गया ?
हमने माना सबकी एक दिन मृत्यु हो ,
किंतु क्यों वह शीघ्र इतने मर गया ?
लोग बतलाते हैं था वह अति भला ,
रास्ते सीधे सदा ही वह चला  ,
रह रहा था जन्म से परदेस में ,
आज होटल छोड़ अपने घर गया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...