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Showing posts from March, 2018

मुक्त मुक्तक : 884 - प्रेम

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पूर्णतः करते स्वयं को जब समर्पित !! प्रेम तब बैरी से कर पाते हैं अर्जित !! जान लोगे यदि गुलाबों से मिलोगे , पुष्प कुछ काँटों में क्यों रहते सुरक्षित ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 252 - वो नहीं होगा मेरा.......

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वो नहीं होगा मेरा ये जानता हूँ मैं !! फिर भी उसको अपनी मंज़िल मानता हूँ मैं !! दोस्त अब हरगिज़ नहीं वह रह गया मेरा , फिर भी उस से दुश्मनी कब ठानता हूँ मैं !! पीठ में मेरी वो ख़ंजर भोंकता रहता , उसके सीने पर तमंचा तानता हूँ मैं !! वह मुझे ऊपर ही ऊपर जान पाया है , उसको तो अंदर तलक पहचानता हूँ मैं !! सूँघते ही जिसको वो बेहोश हो जाते , रात दिन उस बू को दिल से टानता हूँ मैं !! वो मेरी लैला है 'लैला' 'लैला' चिल्लाता , ख़ाक सह्रा की न यों ही छानता हूँ मैं !! ( टानता = सूँघता , सह्रा = जंगल ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 883 - इक पाँव

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क्या शह्र फ़क़त , क़स्बा ही न बस ,  इक गाँव से भी चल सकते हैं !! कोटर , बिल , माँद , दरार , क़फ़स से  ठाँव से भी चल सकते हैं !! होते हैं दो पंख भी बेमानी  उड़ने का इरादा हो न अगर , मंज़िल की मगर धुन हो तो कटे  इक पाँव से भी चल सकते हैं !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 882 - कुत्ता

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गर्दिश तक में कुत्ता भी आराम से सोता है !! मीठे ख़्वाबों के दरिया में लेता गोता है !! अहमक इंसाँ ख़ुशियों में भी करवट बदल बदल , बिस्तर पर सब रात बैठ-उठ रोता-धोता है !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 881 - बाँग

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बाँग मुर्गे सी लगाओ जो  जगाना हो तो !! गाओ बुलबुल सा किसी को जो  सुनाना हो तो !! फाड़ चिल्लाओ गला  चुप न रहो तुमको उसे , जो न आता हो अगर पास  बुलाना हो तो !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 880 - एक कोंपल........

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एक कोंपल था पका पत्ता न था , शाख से अपनी वो फिर क्यों झर गया ? हमने माना सबकी एक दिन मृत्यु हो , किंतु क्यों वह शीघ्र इतने मर गया ? लोग बतलाते हैं था वह अति भला , रास्ते सीधे सदा ही वह चला  , रह रहा था जन्म से परदेस में , आज होटल छोड़ अपने घर गया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 251 - खोए-खोए ही रहते हैं.....

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मेरी तक्लीफ़ का उनको अंदाज़ क्या ? हँसने का भी उन्हें है पता राज़ क्या ? आजकल खोए-खोए ही रहते हैं तो ' कर चुके वो मोहब्बत का आग़ाज़ क्या ? जो बुलाते हैं दुत्कार के फिर मुझे , उनकी दहलीज़ मैं जाऊँगा बाज़ क्या ? ऐसी चलती है उनकी ज़ुबाँ दोस्तों , उसके आगे चलेगी कोई गाज़ क्या ? पेट भी जो हमारा न भर पाए गर , उस हुनर पर करें भी तो हम नाज़ क्या ? तोहफ़े में मुझे तुम न संदूक दो , मुझसा खाली रखेगा वहाँ साज़ क्या ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 250 - कुत्ते सी हरकत

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आपस में बेमक़सद लड़ते मरते देखा है !! इंसाँ को कुत्ते सी हरकत करते देखा है !! गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलने वाले को , मैंने होली में रंगों से डरते देखा है !! गर तुमने देखी है चूहे से डरती बिल्ली , मैंने भी बिल्ली से कुत्ता डरते देखा है !! प्यार में अंधे कितने ही फूलों को हँस-हँसकर , नोक पे काँटों की होठों को धरते देखा है !! हैराँ हूँ कल मैंने इक ज्वालामुखी के मुँह से , लावे की जा ठण्डा झरना झरते देखा है !! कैसा दौर है कल इक भूखे शेर को जंगल में , गोश्त न मिलने पर सच घास को चरते देखा है !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति