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Showing posts from February, 2018

मुक्त मुक्तक : 879 - अच्छी नहीं ज़रा भी.....

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अच्छी नहीं ज़रा भी , है इस क़दर ख़राब !! कहते हैं लोग मेरी है ज़िंदगी अज़ाब !! दिन-रात इतनी मैंने पीयी कि अब तो मेरी , बहने लगी रगों में ख़ूँ की जगह शराब !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 878 - यह को वह .......

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तजकर कभी , कभी सब कुछ गह लिखा गया !! पीकर कभी , कभी प्यासा रह लिखा गया !! लिखने का जादू सर चढ़ बोला तो बोले सब , ये क्या कि मुझसे ' यह ' को भी ' वह ' लिखा गया !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 877 - गूँगी तनहाई.......

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गूँगी तनहाई में चुपचाप जब मैं रहता हूँ !! रौ में जज़्बातों की तिनके से तेज़ बहता हूँ !! लिखने लगता हूँ मैं तब शोक-गीत रोता सा , या कभी हँसती हुई शोख़ ग़ज़ल कहता हूँ !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

चित्र काव्य : २

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बहुत ही ख़ास बहुत ही अज़ीज़ था मेरा , वो उस जगह पे कहीं हाय खो गया इक दिन ॥  चुरा के मुझ से मेरा दिल क़रार की नींदें , बग़ैर मुझ को बताये ही सो गया इक दिन ॥  -डॉ॰ हीरालाल प्रजापति

चित्र काव्य

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यों ही कमर पे हाथ न रखकर खड़ा हूँ मैं !!
खंभे सा उसके इंतज़ार में गड़ा हूँ मैं !!
बैठे हैं वो न आने की क़सम वहाँ पे खा ,
उनको यहाँ बुलाने की ज़िद पर अड़ा हूँ मैं !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 876 - रक्तरंजित

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मैंने पाया है क्या और किससे हूँ वंचित ? पूर्ण कितना हूँ मैं और कितना हूँ खंडित ?  भेद पूछो जो क्या है मेरी लालिमा का ,  जान जाओगे मैं कितना हूँ रक्तरंजित ?    -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 249 - सिर को झुकाना पड़ा..........

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आँखों को आज उससे चुराना पड़ा मुझे !!  कुछ कर दिया कि सिर को झुकाना पड़ा मुझे !! जिसको मैं सोचता था ज़मीं में ही गाड़ दूँ , उसको फ़लक से ऊँचा उठाना पड़ा मुझे !! उसको हमेशा खुलके हँसाने के वास्ते , कितना अजीब है कि रुलाना पड़ा मुझे !!  उसकी ही बात उससे किसी बात के लिए , कहने के बदले उल्टा छुपाना पड़ा मुझे !! नौबत कुछ ऐसी आयी कि दिन-रात हर घड़ी , रटता था जिसको उसको भुलाना पड़ा मुझे !! दुश्मन ज़रूर था वो मगर इतना प्यारा था , उसको जो जलते देखा बुझाना पड़ा मुझे !! सचमुच ही बुलंदी को बस इक बार चूमने , ख़ुद को हज़ार बार गिराना पड़ा मुझे !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 248 - चीता बना दे.........

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मत बिलाशक़ तू कोई भी नाख़ुदा दे !!                     सिर्फ़ मुझको तैरने का फ़न सिखा दे !!                      जो किसी के पास में हरगिज़ नहीं हो ,                      मुझको कुछ ऐसी ही तू चीज़ें जुदा दे !!                       सबपे ही करता फिरे अपना करम तू ,                      मुझपे भी रहमत ज़रा अपनी लुटा दे !!                     जिस्म तो शुरूआत से हासिल है उसका ,                    तू अगर मुमकिन हो उसका दिल दिला दे !!                         सिर्फ़ ग़म ही ग़म उठाते फिर रहा हूँ ,                   कुछ तो सिर पर ख़ुशियाँ ढोने का मज़ा दे !!                        सबके आगे जिसने की तौहीन मेरी ,                       मेरे कदमों में तू उसका सिर झुका दे !!                         हर कोई कहता है मैं इक केंचुआ हूँ ,                       तू हिरन मुझको या फिर चीता बना दे !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : बिन तुम्हारे.......

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अति मधुर संगीत कर्कश चीख़-चिल्लाहट लगे !!
                बुलबुलों का गान भूखे सिंह की गुर्राहट लगे !!
            साथ जब तक तुम थे भय लगता था मुझको मृत्यु से ,
                बिन तुम्हारे ज़िंदगी से खीझ उकताहट लगे !!
                             -डॉ. हीरालाल प्रजापति