जूता - चित्र काव्य : २



बर्फ़ की तह पर हिरन सा दौड़कर भी कब गला ?
धूप में अंगार सी कब रेत पर मैं थम जला ?
मेरी मंज़िल के तो सब ही रास्ते पुरख़ार थे ,
उनपे हँसते -हँसते मैं जूतों के ही दम पर चला !
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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