Wednesday, January 31, 2018

चित्र काव्य : भूखा बेरोज़गार


जूता - चित्र काव्य : २



बर्फ़ की तह पर हिरन सा दौड़कर भी कब गला ?
धूप में अंगार सी कब रेत पर मैं थम जला ?
मेरी मंज़िल के तो सब ही रास्ते पुरख़ार थे ,
उनपे हँसते -हँसते मैं जूतों के ही दम पर चला !
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, January 28, 2018

मुक्त मुक्तक : 875 - लुकता


  
                मत ज़रा भी सोचना आख़िर गया हूँ मैं किधर ?
                ढूँढना भी मत कहीं जा कर उधर या आ इधर ।
                गिरके तेरी नज़रों से तुझसे ही तो बचने को मैं ,
                उस जगह जा छिप गया कोई नहीं लुकता जिधर ।।
                               -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, January 5, 2018

मुक्तक : 874 - औरों को गिराने गड्ढे में.........

         
  औरों को गिराने गड्ढे में ख़ुद डूब कुएँ में बैठे हैं ।।
  ग़ैरों को हराने में अपना सब हार जुएँ में बैठे हैं ।।
   उनको ना नजर आ जाएँ बस ये सोचकर उनके ही आगे ,
    कुछ दूर किसी गीली लकड़ी से उठते धुएँ में बैठे हैं ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, January 1, 2018

शुभकामना नववर्ष की.........

बादलों से गिर धरा पर कड़कड़ाती बिजलियों को ।।
जल से बाहर तड़फड़ाती फड़फड़ाती मछलियों को ।।
 फूल पर मंडराते भँवरों स्वस्थ-सुंदर तितलियों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
तंग गलियां सूनी सड़कों घर-मकानों के लिए ।।
मंदिरों की आरती कोठों के गानों के लिए ।।
सब पुलिसवालों को , सेना के जवानों के लिए ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
पापियों का सर जो काटें उन छुरी-तलवारों को ।।
शत्रु के पग में चुभें उन कीलों को उन ख़ारों को ।।
वक्त पर जो काम आये उन बुरे-बेकारों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...