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Showing posts from January, 2018

चित्र काव्य : भूखा बेरोज़गार

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जूता - चित्र काव्य : २

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बर्फ़ की तह पर हिरन सा दौड़कर भी कब गला ? धूप में अंगार सी कब रेत पर मैं थम जला ? मेरी मंज़िल के तो सब ही रास्ते पुरख़ार थे , उनपे हँसते -हँसते मैं जूतों के ही दम पर चला ! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

जूता - चित्रकाव्य

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मुक्त मुक्तक : 875

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मत ज़रा भी सोचना आख़िर गया हूँ मैं किधर ?
                ढूँढना भी मत कहीं जा कर उधर या आ इधर ।
                गिरके तेरी नज़रों से तुझसे ही तो बचने को मैं ,
                उस जगह जा छिप गया कोई नहीं लुकता जिधर ।।
                               -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 874 - औरों को गिराने गड्ढे में.........

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औरों को गिराने गड्ढे में ख़ुद डूब कुएँ में बैठे हैं ।।   ग़ैरों को हराने में अपना सब हार जुएँ में बैठे हैं ।।    उनको ना नजर आ जाएँ बस ये सोचकर उनके ही आगे ,     कुछ दूर किसी गीली लकड़ी से उठते धुएँ में बैठे हैं ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

शुभकामना नववर्ष की.........

बादलों से गिर धरा पर कड़कड़ाती बिजलियों को ।।
जल से बाहर तड़फड़ाती फड़फड़ाती मछलियों को ।।
 फूल पर मंडराते भँवरों स्वस्थ-सुंदर तितलियों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
तंग गलियां सूनी सड़कों घर-मकानों के लिए ।।
मंदिरों की आरती कोठों के गानों के लिए ।।
सब पुलिसवालों को , सेना के जवानों के लिए ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
पापियों का सर जो काटें उन छुरी-तलवारों को ।।
शत्रु के पग में चुभें उन कीलों को उन ख़ारों को ।।
वक्त पर जो काम आये उन बुरे-बेकारों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति