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नववर्ष

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मरने पे या किसी के जन्मने पे नचेंगे ।।
जानूँ न क्यों वलेक लोग बाग जगेंगे ।।
तुम भी तमाशा देखने को रात न सोना ।।
मरने पे मेरे थोड़ा भी मायूस न होना ।।
31 दिसंबर मैं चीख़ दे ख़बर रहा ।।
01 जनवरी को जन्मा मैं नववर्ष मर रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 891 - दुशाला

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चहुँदिस स्वयं को मैंने जिससे लपेट डाला ।। ऊनी नहीं न है वो मृत वन्य मृग की छाला ।। चलते हैं शीत लहरों के तीर जब बदन पे , बन ढाल प्राण रक्षा करता यही दुशाला ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 270 - फ़ित्रत

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हमने अजीब ही कुछ फ़ित्रत है पायी यारों ।।
हर बात धीरे-धीरे-धीरे ही भायी यारों ।।
उस तक पलक झपकते हम मीलों दूर पहुँचे ,
वह दो क़दम भी हम तक बरसों न आयी यारों ।।
उसको तो मौत ने भी ख़ुशियाँ ही ला के बाँटीं ,
हमको तो ज़िंदगी भी बस ग़म ही लायी यारों ।। 
भूखे रहे मगर हम इतना सुकूँ है हमने ,
औरों की छीनकर इक रोटी न खायी यारों ।।
बदली समंदरों पर जाकर बरसने वाली ,
हैराँ हूँ आज रेगिस्तानों पे छायी यारों ।।
ख़ुश हूँ कि ग़ुस्लख़ाने में आज उसने मेरी ,
दिल से ग़ज़ल तरन्नुम में गुनगुनायी यारों ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 890 - तस्वीर

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फूलों सी खिलखिलाती , तारों सी झिलमिलाती ।।
आँखों को हर किसी की बेसाख़्ता लुभाती ।।
वो जिनकी ज़िंदगी को ग़म ने जकड़ रखा है ,
तस्वीर उनकी अक्सर होती है मुस्कुराती ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 889 - आश्रित

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पेट जो परिवार का ही पालने में मर गया ।।
शुष्क आँखों के मरुस्थल आँसुओं से भर गया ।।
अपने पालक का मरण यूँ देख उसका आश्रित आह , 
लोग डरते मृत्यु से वह ज़िंदगी से डर गया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

कविता : नास्तिकता क्यों ?

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धर्मभीरु भर घृणा से करते हैं आपस में बत ।
धर्म से च्युत ईश्वर से सर्वथा हूँँ मैं विरत ।। 
पूछते रहते हैं मैं क्यों नास्तिक हूँँ तो सुनो ।
पूर्णत: ध्यानस्थ होकर तथ्यत: सर्वस गुनो ।। 
किंतु यह भी जान लो मैं यह कभी कहता नहीं ।
वह जिसे भगवान कहते सब जगह रहता नहीं ।।
पूर्णत: आश्वस्त हो निज सत्य को मैं धर रहा ।
सर्वथा है व्यक्तिगत अभिव्यक्त जो मैं कर रहा ।।
यह मेरी और उस ख़ुदा की शत्रुता का रूप है ।
जिसने मरुथल में मुझे जो धूप पर दी धूप है ।।
लोग कहते हैं कि उसके हाथ में हर बात है ।
वह जो चाहे सब छुड़ाले या वरे सौग़ात है ।।
वह असंभव को भी संभव चुटकियों में कर धरे ।
वह निपूतों की भी गोदी बाल बच्चों से भरे ।।
सच कहूँँ गुड़िया से भी प्यारी महज औलाद इक ।
हमने भी पाई थी कितनी मन्नतों के बाद इक ।।
यूँँ लगा जैसे मरुस्थल में हुई गंगा प्रकट ।
मिल गई अंधों को आँँखें भिक्षुओं को स्वर्णघट ।।
शुक्रिया रब का कभी करना ना हम भूले मगर ।
हो गया इक दिन ख़फ़ा जाने न वो किस बात पर ।।
सच कहूँँ सच्चाई से भी अत्यधिक सच्ची मेरी ।
अल्पवय में ही अचानक पुष्प सी बच्ची मेरी ।।
खेलते ही खेलते इक दिन अचानक यों गिरी ।
लाइलाज ऐसे भयानक रोग से वह जा घि…

मुक्त ग़ज़ल : 269 - आसव

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शुद्ध गंगाजल से आसव हो गया हूँ ।।
   शिव था बिन तेरे पुरा-शव हो गया हूँ ।।
   बुलबुलों से कोयलों से भी मधुर मैं ,
   तुम नहीं तो मूक-नीरव हो गया हूँ ।।
   जानता हूँ  तुम नहीं होओगे मेरे ,
   क्या करूँ हृद-आत्म से तव हो गया हूँ ?
   तुम रहे जैसे थे वैसे ही तो मैं भी ,
   कौन सा प्राचीन से नव हो गया हूँ ?
   शक्य शेरों को भी मैं पहले नहीं था ,
   अब श्रृगालों को भी संभव हो गया हूँ !! 
   जैसे बिन राधा हुए थे कृष्ण , तुम बिन 
   मैं भी त्यों सियहीन राघव हो गया हूँ ।।
( आसव = शराब , पुरा-शव = पुरानी लाश , मूक = चुप , नीरव = बिना शब्द का , तव = तुम्हारा , शक्य = संभव , श्रृगाल = गीदड़ ,       राघव = श्रीराम )
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 888 - भगवान बिक रहा है

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क्या क्या न इस जहाँ में सामान बिक रहा है ?
   बकरा कहीं ; कहीं पर इंसान बिक रहा है ।।
   हैरान हूँ कि सब कुछ महँगा यहाँ है लेकिन ,
   सस्ता दुकाँ दुकाँ में भगवान बिक रहा है ।। 
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 268 - मेहँदियाँ

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मुझसे तुम दो ही पल भर सटी रह गयीं ।। 
    सारी दुनिया की आँखें फटी रह गयीं ।। 
    मैं गुटक कर ख़ुशी कद्दू होता गया , 
    तुम चबा फ़िक्र को बरबटी रह गयीं ।। 
    चाहकर बन सका मैं न सर्कस का नट ,
    तुम नहीं चाह कर भी नटी रह गयीं ।। 
    और सब कुछ गया भूल मैं अटपटी ,
    चंद बातें तुम्हारी रटी रह गयीं ।।
    इक भी दुश्मन न अपना बचा जंग में ,
    इस दफ़ा लाशें बस सरकटी रह गयीं ।।
    तेरे हाथों में लगने की ज़िद पर अड़ी , 
    मेहँंदियाँ कितनी ही बस बटी रह गयीं ।।
              -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 887 - धृतराष्ट्र

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बैठे ठाले मनोरंजन को 
  अपना धंधा बोल न तू ।।
  बोगनविलिया के फूलों को 
  रजनीगंधा बोल न तू ।।
  जिनके मन के दृग हों फूटे ,
  उनको कह धृतराष्ट्र बुला ,
  किंतु कभी बस चर्मचक्षु-
  हीनों को अंधा बोल न तू ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत - हाथ काँधों पर नहीं.......

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हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,
पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!
पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,
ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!
हाथ में लेकर चिरागों क्या मशालों को ,
ढूँँढने पर भी न पाओगे कहीं मुझसा ।।
मैं बुरा हूँँ या भला हूँँ इस ज़माने में ,
दूसरा हरगिज़ यहाँँ कोई नहीं मुझसा ।।
क्यों हूँँ मैं ? जानूँँ न मैं इतना मगर तय है ,
मैं अजब हूँँ ,मैं ग़ज़ब हूं ,मैं चुनिंदा हूँँ ।। 
हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,
पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!
पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,
ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!
वो ज़माना क्या हुआ जब मुझ से जुड़कर तुम ,
चाहते थे शह्र में मशहूर हो जाऊँँ ? 
कर रहे हो रात दिन ऐसे जतन अब क्यों ,
मैं तुम्हारी ज़िंदगी से दूर हो जाऊँँ ?
मत रगड़ , धो-धो मिटाने की करो कोशिश ,
दाग़ माथे का नहीं मैं एक बिंदा हूँँ ।।
हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,
पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!
पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,
ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!
( पर = पंख ; बिंदा = माथे पर लगाने वाली बड़ी गोल बिंदी )
-डॉ. हीर…

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक

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तोप से बंदूक से इक तीर हो बैठा ।।
नौजवानी में ही साठा पीर हो बैठा ।।
चुप रहा तो बज गया दुनिया में गूँँगा वो ,
कह उठा तो सीधे ग़ालिब-मीर हो बैठा ।।
बनके इक सय्याद रहता था वो जंगल में ,
आके दर्याओं में माहीगीर हो बैठा ।।
हिज़्र में दिन-रात सोते-जागते फिरते ,
रटते-रटते हीर...राँँझा हीर हो बैठा ।।
जो कहा करता था इश्क़ आज़ाद करता है ,
उसके ही पाँँवों की वह ज़ंजीर हो बैठा ।।
इस क़दर उसको सताया था ज़माने ने ,
वह छड़ी से लट्ठ फिर शमशीर हो बैठा ।।
उसने मर्यादा को अपनाया तो सच मानो ,
वह निरा रावण...खरा रघुवीर हो बैठा ।।
( साठा=साठ वर्ष का ,पीर=वृद्ध , सय्याद=चिड़ीमार ,
दर्या=नदी ,माहीगीर=मछली पकड़ने वाला ,हिज़्र=विरह ,
शमशीर=तलवार ,रघुवीर=रामचंद्र )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

बड़ाकवि अटल

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वो सियासी पूस की 
रातों का सूरज ढल गया ।। इक बड़ाकवि अटल 
नामक इस जगत से टल गया ।। राजनीतिक पंक में 
खिलता रहा जो खिलखिला , आज वो सुंदर मनोहर 
स्वच्छ भोर कमल गया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 266 - ढोल बजाकर

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आँसू उनकी आंँखों का चश्मा है गहना है ।।
जिन लोगों का काम ही रोना रोते रहना है ।।
झूठ है रोने से होते हैं ग़म कम या फिर ख़त्म ,
ताल ठोंंक कर ,ढोल बजाकर सच ये कहना है ।।
ख़ुशियों का ही जश्न मनाया जाता महफ़िल में ,
दर्द तो जिसका है उसको ही तनहा सहना है ।।
क्या मतलब मज़्बूती छत दीवार को देने का ,
आख़िर बेबुनियाद घरों को जल्द ही ढहना है। ।। 
ज्यों ताउम्र हिमालय का है काम खड़े रहना ,
यूँँ ही गंगा का मरते दम तक बस बहना है ।।
क्यों नज़रें ना गाड़ें तेरे तन पर अंधे भी ,
क्यों तूने बारिश में झीना जामा पहना है ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत - दिल जोड़ने चले हो......

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दिल जोड़ने चले हो ठहरो ज़रा संँभलना ।।
टूटे हैं दिल हज़ारों इस दिल्लगी में वर्ना ।।
मासूमियत की तह में रखते हैं बेवफ़ाई ।
मतलब परस्त झूठी करते हैं आश्नाई ।
राहे वफ़ा में देखो यूँँ ही क़दम न धरना ।।
टूटे हैं दिल हज़ारों इस दिल्लगी में वर्ना ।। 
रुस्वाई, बेवफ़ाई, दर्दे जुदाई वाली ।
गुंजाइशें हैं इसमें ख़ूँ की रुलाई वाली ।
आसाँ नहीं है हरगिज़ इस राह से गुजरना ।।
टूटे हैं दिल हज़ारों इस दिल्लगी में वर्ना ।। 
मुमकिन नहीं मोहब्बत की जंग में बताना ।
मारेंगे बाज़ी आशिक़ या संगदिल ज़माना ।
आग़ाज़ कर रहे हो अंजाम से न डरना ।।
टूटे हैं दिल हज़ारों इस दिल्लगी में वर्ना ।। 
आग़ाज़े आशिक़ी में ख़तरा नज़र न आए ।
अंजाम ज़िंदगी पर ऐसा असर दिखाए ।
नाकामे इश्क़ को कई कई बार होता मरना ।।
टूटे हैं दिल हज़ारों इस दिल्लगी में वर्ना ।। 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 265 - न पीते हैं पानी.....

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अजीब हैं उजालों को शम्मा बुझाते ।।
परिंदों के पर बांँधकर वो उड़ाते ।।
हैं ख़ुद फूल-पत्ती से भी हल्के-फुल्के ,
मगर सर पे ईंट और पत्थर उठाते ।।
वो आवाज़ देकर कभी भी न मुझको ,
इशारों से ही क्यों हमेशा बुलाते ?
न पीते हैं पानी को जाकर कुओं पर ,
वो अंगार खा प्यास अपनी बुझाते ।।
वो किस्सा सुनें ग़ौर से ग़ैर का भी 
न रोना किसी को भी अपना सुनाते ।।
कन्हैया हैं ले आड़ माखन की दरअस्ल ,
अरे गोपियों का वो दिल हैं चुराते ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म

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जब ज़ियादा मिल रहा क्यों कम मैं रख लूँँ ?
   है मयस्सर जब मज़ा क्यों ग़म में मैं रख लूँँ ?
   इक न इक दिन ज़ख्म तो वह देंगे आख़िर ,
   क्यों न लेकर आज ही मरहम मैं रख लूँँ ?
   इस क़दर प्यासी है सोचूँ इस नदी के
   वास्ते बारिश के कुछ मौसम मैं रख लूँँ !!
   उसकी क़िस्मत में नहीं का'बा पहुँँचना ,
   क्यों ना क़त्रा भर उसे ज़मज़म मैं रख लूँँ ?
   बस शराफ़त से बसर दुनिया में मुश्किल ,
   क्यों न ख़ुद में थोड़े पेचोख़म मैं रख लूँँ ?
   दुश्मनों के बीच रहने जा रहा हूँँ ,
   क्या छुरे-चाकू व गोले-बम मैं रख लूँँ ?
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 263 - रागा करें

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एक भी दिन का कभी हरगिज़ न हम नागा करें ।।
   एक उल्लू और इक हम रात भर जागा करें ।।
   उनपे हम दिन रात बरसाते रहें चुन-चुन के फूल ,
   हमपे वो गोले दनादन आग के दागा करें ।।
   जो हमारे कान के पर्दों को रख दे फाड़कर ,
   ऐसे सच से बचके कोसों दूर हम भागा करें ।।
   किस लिए तुम पूछते हो और हम बतलाएँँ क्यों ,
   उनके हम क्या हैं हमारे कौन वो लागा करें ?
   लोग धागे से यहाँँ हम लोहे की ज़ंजीर से ,
   खुल न जाएँँ कस के ऐसे ज़ख़्म को तागा करें ।।
   वो नहीं अच्छे मगर हैं ख़ूबसूरत इस क़दर ,
   हम तो क्या दुश्मन भी उनके उनसे बस रागा करें ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

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उसको रोने का यक़ीनन हर सबब पुख़्ता मिला ।।
   फिर भी वह हर वक्त लोगों को फ़क़त हंँसता मिला ।।
   मंज़िलों पर लोग सब आराम फ़रमाते मिले ,
   वह वहाँँ भी कुछ न कुछ सच कुछ न कुछ करता मिला ।।
   सब उछलते-कूदते जब देखो तब चलते मिले ,
   वह हमेशा ही समुंदर की तरह ठहरा मिला ।।
   " मैं तो खुश हूं सच बहुत खुश आंँख तो यूँँ ही बहे ,
   अपने हर पुर्साने ग़म से वह यही कहता मिला ।।
   अपने ज़ालिम बेवफ़ा महबूब के भी वास्ते ,
   हर जगह पागल सरीखा वह दुआ करता मिला ।।
   हर कोई इक दूसरे को कर रहा नंगा जहाँँ ,
   वह वहाँँ उघड़े हुओं पर कुछ न कुछ ढँकता मिला ।।
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 261 - ग़ज़लें

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नंगे पांँवों जब काँटों पर चलना आता था ।।
तब मुझ को तक़्लीफ़ में भी बस हंँसना आता था ।।
उसके ग़म में सच कहता हूंँ हो जाता पागल ,
मेरी क़िस्मत मुझको ग़ज़लें कहना आता था ।।
उसने मुंँह से कब कुछ बोला रब का शुक्र करो ,
मुझ को बचपन से आंँखों को पढ़ना आता था ।।
उसकी जाने कैसी-कैसी पोलें खुल जातीं ,
वो तो राज़ मुझे सीने में रखना आता था ।।
वह तन कर ही रहता था तो कट बैठा जल्दी ,
मैं हूंँ सलामत मुझको थोड़ा झुकना आता था ।।
इंसाँँ हूंँ यह सोच किसी को फुफकारा भी कब ,
वरना मुझ को भी सांँपों सा डसना आता था ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 260 - कैसे-कैसे लोग

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कैसे-कैसे लोग दुनिया में पड़े हैं ।।
   सोचते पाँवों से सिर के बल खड़े हैं ।।
   आइनों के वास्ते अंधे यहाँँ , वाँ
   गंजे कंघों की खरीदी को अड़े हैं ।।
   जिस्म पर खूब इत्र मलकर चलने वाले ,
   कुछ सड़े अंडों से भी ज्यादा सड़े हैं ।।
   बस तभी तक जिंदगी ख़ुशबू की समझो ,
   जब तलक गहराई में मुर्दे गड़े हैं ।।
   देखने में ख़ूबसूरत इस जहाँँ के ,
   आदमी कुछ बेतरह चिकने घड़े हैं ।।
   सिर न जब तक कट गिरा हम दम से पूरे ,
   ज़िंदगी से जंग रोज़ाना लड़े हैं ।।
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 259 - पापड़

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जिस्म धन-दौलत सा जोड़ा जा रहा है ।।
   और दिल पापड़ सा तोड़ा जा रहा है ।।
   दौड़ता है पीछे-पीछे मेरा कछुआ ,
   आगे-आगे उनका घोड़ा जा रहा है ।।
   पहले ख़ुद डाला गया उस रास्ते पर ,
   अब उसी से मुझको मोड़ा जा रहा है ।।
   तोड़कर फिर काटकर हम नीबुओं को ,
   मीठे गन्ने सा निचोड़ा जा रहा है ।।
   उनका ग़म अब धीरे-धीरे , धीरे-धीरे ,
   थोड़ा-थोड़ा , थोड़ा-थोड़ा जा रहा है ।।
   वो हुए नाकाम अपनी वज्ह से ही ,
   ठीकरा औरों पे फोड़ा जा रहा है ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 258 - फूल.....

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देते हैं ज़ख़्म पत्थर को भी यहाँँ के फूल ।।
देती पहाड़ को भी टक्कर इधर की धूल ।।
हेठी क्या इसमें ख़ुद बढ़ हाथी सुलह करे ,
चींटी से दुश्मनी को देना न ठीक तूल ।।
सर सर के बदले टांँगों के बदले सिर्फ टाँँग ,
इंसाफ़ का मुझे यह लगता सही उसूल ।।
सोने की चौखटों में कस कस भी कीजै नज़्र ,
तब भी रहेंगे अंधों को आइने फ़ुज़ूल ।।
पाए हैं उस जगह से सचमुच ही उसने आम ,
बोए थे जिस जगह पर उसने कभी बबूल ।।
करते ज़रूर हैं वो मंज़ूर करना इश्क़ ,
लेकिन निकाह करना करते नहीं क़ुबूल ।।
क्या हो गया गुनह पर अब वो करें गुनाह ,
करते नहीं थे भूले से भी कभी जो भूल ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......

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बन सका चिकना न सब कुछ खुरदरा बनवा लिया ।।
  सबने मीनार हमने बौना चौतरा बनवा लिया ।।
  जब बना पाए न हम अपना मकाँ तो जीते जी ,
  क़ब्र खुदवा अपनी अपना मक़्बरा बनवा लिया ।।
  ज़ुर्म क्या गर अपनी बेख़बरी में अपने घर ही पर ,
  अपने बावर्ची से हलवा चरपरा बनवा लिया ।।
  उन से खिंच कर उनकी हद में जा न पहुंँचेंं सोचकर ,
  हमने अपने आसपास इक दायरा बनवा लिया ।।
  प्यास को अपनी बुझाने घर न गंगा ला सके ,
  इसलिए आंँगन में छोटा पोखरा बनवा लिया ।।
  हुक़्म के उसके ग़ुलाम हम इस क़दर थे इक दफ़ा,
  उसने दी चोली तो हमने घाघरा बनवा लिया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल

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ना दोस्ती न रिश्तेदारी न प्यार है ।। दुनिया में सबसे बढ़कर बस रोज़गार है ।। मंज़िल पे हमसे पहले पहुंँचे न क्यों वो फिर , हम पर न साइकिल भी उस पर जो कार है ।। सामाँँ है जिसपे ऐशो-आराम के सभी , है फूल उसी को जीवन बाक़ी को भार है ।। बारूद के धमाके सा दे सुनाई क्यों , जब-जब भी उसके दिल में बजता सितार है ? हर वक्त रोशनी का है इंतिज़ाम यूंँ , रातों को भी वहांँ पर लगता नहार है ।। उतना है वह परेशाँँ , उतना ही ग़मज़दा , इस दौर में जो जितना ईमानदार है ।।
( नहार = दिन , दिवस ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 255 - वो मेरा है.......

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बड़ी जिद्दोजहद से , कशमकश से , सख्त़ मेहनत से ।। मोहब्बत मैंने की दुश्मन से अपने घोर नफ़रत से ।। न भूले भी पड़ा क्यों इश्क़ के पचड़ों - झमेलों में ? बचाए ख़ुद को रखने ही ज़माने भर की आफ़त से ।। वो मेरा है ; मगर अच्छा नहीं , कब तक रहूंँ मैं चुप ? बहुत मज़्बूर हूँ इस अपनी सच कहने की आदत से ।। न रोऊँ मैं अजब है अपनी बर्बादी पे हांँ लेकिन , मैं जल उठता हूंँ झट काफ़ूर सा औरों की बरकत से ।। मेरा सर काट के फ़ुटबॉल ही उसकी बना लो तुम , रहम करके न खेलो राह चलते मेरी अस्मत से ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 886 - रिक्शे सी ज़िन्दगी......

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अजगर जहाँ में मैं भी अब बन गरुड़ रहा हूँ ।। मंज़िल पे रख निगाहें कहीं पर न मुड़ रहा हूँ ।। रिक्शे सी ज़िन्दगी को कर दूँ मैं कार  कैसे ? ये सोच सोच पंखों के बिन ही उड़ रहा हूँ ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़जल : 254 - चोरी चोरी

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उसको चोरी चोरी छुप कर देखना भाता नहीं है ।। क्या करूँ वह सामने खुलकर मेरे आता नहीं है ? लोग सब दहशतज़दा तकते ही हों मुझको मगर क्यों , धमकियों से भी वो मेरी टुक भी घबराता नहीं है ? फाँसियों पर टाँगने वाला ज़रा सी भूल पर वो , क्यों गुनाहों पर भी मेरे मुझको मरवाता नहीं है ? क्यों दुआएखै़र मेरे वास्ते करता फिरे वो ? और क्यों....पूछूंँ तो अपना नाम बतलाता नहीं है ? नाम पर नुक्स़ाँ के उमरा सर उठाते आस्मांँ को , लाल गुदड़ी का वो लुटपिट कर भी चिल्लाता नहीं है ।। ( दुआएख़ैर = कुशलता की कामना ,नुक़्साँ = घाटा , उमरा = अमीर लोग ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 885 - सूखा तालाब

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कैसा ये अजीबोग़रीब मेरा जहाँ है ? मौसम में बारिशों के भी सूखा ही यहाँ है !! सोना न चाँदी , हीरे न मोती समझना तुम  तालाब में यूँ अपने ढूँढूँ पानी कहाँ है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 253 - दामाद

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ग़मज़दा लोगों को क्यों मैं याद रहता हूँ ? दर्द में भी जो ख़शी सा शाद रहता हूँ !! अपने सीने में जकड़ लो बाँध लो कसके , ऐसी ही क़ैदों में मैं आज़ाद रहता हूँ !! उसके क़ब्ज़े में मैं उसकी ज़िद की ख़ातिर सच , बाप होकर उसका बन औलाद रहता हूँ !! शह्र की उजड़ी हुई हालत पे मत जाओ , अब भी मैं तब सा यहाँ आबाद रहता हूँ !! जाने क्यों उसकी ख़ुदी के इक सुकूँ भर को , होके अव्वल भी मैं उसके बाद रहता हूँ !! वक्त देखो जो मुझे दुत्कारते आए , बनके उनका ही मैं अब दामाद रहता हूँ !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 884 - प्रेम

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पूर्णतः करते स्वयं को जब समर्पित !! प्रेम तब बैरी से कर पाते हैं अर्जित !! जान लोगे यदि गुलाबों से मिलोगे , पुष्प कुछ काँटों में क्यों रहते सुरक्षित ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 252 - वो नहीं होगा मेरा.......

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वो नहीं होगा मेरा ये जानता हूँ मैं !! फिर भी उसको अपनी मंज़िल मानता हूँ मैं !! दोस्त अब हरगिज़ नहीं वह रह गया मेरा , फिर भी उस से दुश्मनी कब ठानता हूँ मैं !! पीठ में मेरी वो ख़ंजर भोंकता रहता , उसके सीने पर तमंचा तानता हूँ मैं !! वह मुझे ऊपर ही ऊपर जान पाया है , उसको तो अंदर तलक पहचानता हूँ मैं !! सूँघते ही जिसको वो बेहोश हो जाते , रात दिन उस बू को दिल से टानता हूँ मैं !! वो मेरी लैला है 'लैला' 'लैला' चिल्लाता , ख़ाक सह्रा की न यों ही छानता हूँ मैं !! ( टानता = सूँघता , सह्रा = जंगल ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 883 - इक पाँव

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क्या शह्र फ़क़त , क़स्बा ही न बस ,  इक गाँव से भी चल सकते हैं !! कोटर , बिल , माँद , दरार , क़फ़स से  ठाँव से भी चल सकते हैं !! होते हैं दो पंख भी बेमानी  उड़ने का इरादा हो न अगर , मंज़िल की मगर धुन हो तो कटे  इक पाँव से भी चल सकते हैं !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 882 - कुत्ता

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गर्दिश तक में कुत्ता भी आराम से सोता है !! मीठे ख़्वाबों के दरिया में लेता गोता है !! अहमक इंसाँ ख़ुशियों में भी करवट बदल बदल , बिस्तर पर सब रात बैठ-उठ रोता-धोता है !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 881 - बाँग

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बाँग मुर्गे सी लगाओ जो  जगाना हो तो !! गाओ बुलबुल सा किसी को जो  सुनाना हो तो !! फाड़ चिल्लाओ गला  चुप न रहो तुमको उसे , जो न आता हो अगर पास  बुलाना हो तो !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 880 - एक कोंपल........

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एक कोंपल था पका पत्ता न था , शाख से अपनी वो फिर क्यों झर गया ? हमने माना सबकी एक दिन मृत्यु हो , किंतु क्यों वह शीघ्र इतने मर गया ? लोग बतलाते हैं था वह अति भला , रास्ते सीधे सदा ही वह चला  , रह रहा था जन्म से परदेस में , आज होटल छोड़ अपने घर गया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 251 - खोए-खोए ही रहते हैं.....

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मेरी तक्लीफ़ का उनको अंदाज़ क्या ? हँसने का भी उन्हें है पता राज़ क्या ? आजकल खोए-खोए ही रहते हैं तो ' कर चुके वो मोहब्बत का आग़ाज़ क्या ? जो बुलाते हैं दुत्कार के फिर मुझे , उनकी दहलीज़ मैं जाऊँगा बाज़ क्या ? ऐसी चलती है उनकी ज़ुबाँ दोस्तों , उसके आगे चलेगी कोई गाज़ क्या ? पेट भी जो हमारा न भर पाए गर , उस हुनर पर करें भी तो हम नाज़ क्या ? तोहफ़े में मुझे तुम न संदूक दो , मुझसा खाली रखेगा वहाँ साज़ क्या ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 250 - कुत्ते सी हरकत

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आपस में बेमक़सद लड़ते मरते देखा है !! इंसाँ को कुत्ते सी हरकत करते देखा है !! गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलने वाले को , मैंने होली में रंगों से डरते देखा है !! गर तुमने देखी है चूहे से डरती बिल्ली , मैंने भी बिल्ली से कुत्ता डरते देखा है !! प्यार में अंधे कितने ही फूलों को हँस-हँसकर , नोक पे काँटों की होठों को धरते देखा है !! हैराँ हूँ कल मैंने इक ज्वालामुखी के मुँह से , लावे की जा ठण्डा झरना झरते देखा है !! कैसा दौर है कल इक भूखे शेर को जंगल में , गोश्त न मिलने पर सच घास को चरते देखा है !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 879 - अच्छी नहीं ज़रा भी.....

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अच्छी नहीं ज़रा भी , है इस क़दर ख़राब !! कहते हैं लोग मेरी है ज़िंदगी अज़ाब !! दिन-रात इतनी मैंने पीयी कि अब तो मेरी , बहने लगी रगों में ख़ूँ की जगह शराब !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 878 - यह को वह .......

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तजकर कभी , कभी सब कुछ गह लिखा गया !! पीकर कभी , कभी प्यासा रह लिखा गया !! लिखने का जादू सर चढ़ बोला तो बोले सब , ये क्या कि मुझसे ' यह ' को भी ' वह ' लिखा गया !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 877 - गूँगी तनहाई.......

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गूँगी तनहाई में चुपचाप जब मैं रहता हूँ !! रौ में जज़्बातों की तिनके से तेज़ बहता हूँ !! लिखने लगता हूँ मैं तब शोक-गीत रोता सा , या कभी हँसती हुई शोख़ ग़ज़ल कहता हूँ !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

चित्र काव्य : २

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बहुत ही ख़ास बहुत ही अज़ीज़ था मेरा , वो उस जगह पे कहीं हाय खो गया इक दिन ॥  चुरा के मुझ से मेरा दिल क़रार की नींदें , बग़ैर मुझ को बताये ही सो गया इक दिन ॥  -डॉ॰ हीरालाल प्रजापति

चित्र काव्य

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यों ही कमर पे हाथ न रखकर खड़ा हूँ मैं !!
खंभे सा उसके इंतज़ार में गड़ा हूँ मैं !!
बैठे हैं वो न आने की क़सम वहाँ पे खा ,
उनको यहाँ बुलाने की ज़िद पर अड़ा हूँ मैं !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 876 - रक्तरंजित

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मैंने पाया है क्या और किससे हूँ वंचित ? पूर्ण कितना हूँ मैं और कितना हूँ खंडित ?  भेद पूछो जो क्या है मेरी लालिमा का ,  जान जाओगे मैं कितना हूँ रक्तरंजित ?    -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 249 - सिर को झुकाना पड़ा..........

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आँखों को आज उससे चुराना पड़ा मुझे !!  कुछ कर दिया कि सिर को झुकाना पड़ा मुझे !! जिसको मैं सोचता था ज़मीं में ही गाड़ दूँ , उसको फ़लक से ऊँचा उठाना पड़ा मुझे !! उसको हमेशा खुलके हँसाने के वास्ते , कितना अजीब है कि रुलाना पड़ा मुझे !!  उसकी ही बात उससे किसी बात के लिए , कहने के बदले उल्टा छुपाना पड़ा मुझे !! नौबत कुछ ऐसी आयी कि दिन-रात हर घड़ी , रटता था जिसको उसको भुलाना पड़ा मुझे !! दुश्मन ज़रूर था वो मगर इतना प्यारा था , उसको जो जलते देखा बुझाना पड़ा मुझे !! सचमुच ही बुलंदी को बस इक बार चूमने , ख़ुद को हज़ार बार गिराना पड़ा मुझे !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त ग़ज़ल : 248 - चीता बना दे.........

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मत बिलाशक़ तू कोई भी नाख़ुदा दे !!                     सिर्फ़ मुझको तैरने का फ़न सिखा दे !!                      जो किसी के पास में हरगिज़ नहीं हो ,                      मुझको कुछ ऐसी ही तू चीज़ें जुदा दे !!                       सबपे ही करता फिरे अपना करम तू ,                      मुझपे भी रहमत ज़रा अपनी लुटा दे !!                     जिस्म तो शुरूआत से हासिल है उसका ,                    तू अगर मुमकिन हो उसका दिल दिला दे !!                         सिर्फ़ ग़म ही ग़म उठाते फिर रहा हूँ ,                   कुछ तो सिर पर ख़ुशियाँ ढोने का मज़ा दे !!                        सबके आगे जिसने की तौहीन मेरी ,                       मेरे कदमों में तू उसका सिर झुका दे !!                         हर कोई कहता है मैं इक केंचुआ हूँ ,                       तू हिरन मुझको या फिर चीता बना दे !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : बिन तुम्हारे.......

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अति मधुर संगीत कर्कश चीख़-चिल्लाहट लगे !!
                बुलबुलों का गान भूखे सिंह की गुर्राहट लगे !!
            साथ जब तक तुम थे भय लगता था मुझको मृत्यु से ,
                बिन तुम्हारे ज़िंदगी से खीझ उकताहट लगे !!
                             -डॉ. हीरालाल प्रजापति

चित्र काव्य : भूखा बेरोज़गार

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जूता - चित्र काव्य : २

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बर्फ़ की तह पर हिरन सा दौड़कर भी कब गला ? धूप में अंगार सी कब रेत पर मैं थम जला ? मेरी मंज़िल के तो सब ही रास्ते पुरख़ार थे , उनपे हँसते -हँसते मैं जूतों के ही दम पर चला ! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

जूता - चित्रकाव्य

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