मुक्त-ग़ज़ल : 247 - परदेस में.........



देस से परदेस में आकर हुआ मैं ॥
सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ॥
रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री ,
सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ॥
कब रहा काँटा मैं गुस्से में भी कल तक ,
प्यार में भी आजकल खंजर हुआ मैं ॥
हो गया था आदमी जानूँ न कैसे ,
फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ॥
एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे ,
कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ॥
देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग ,
मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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