Posts

Showing posts from December, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 247 - परदेस में.........

देस से परदेस में आकर हुआ मैं ॥ सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ॥ रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री , सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ॥ कब रहा काँटा मैं गुस्से में भी कल तक , प्यार में भी आजकल खंजर हुआ मैं ॥ हो गया था आदमी जानूँ न कैसे , फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ॥ एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे , कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ॥ देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग , मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति