Saturday, December 2, 2017

ग़ज़ल : 247 - परदेस में



देस से परदेस में आकर हुआ मैं ।।
सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ।।1।।
रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री ,
सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ।।2।।
कब रहा काँटा मैं ग़ुस्से में भी कल तक ,
प्यार में भी आजकल ख़ंजर हुआ मैं ।।3।।
हो गया था आदमी जानूँ न कैसे ,
फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ।।4।।
एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे ,
कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ।।5।।
देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग ,
मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ।।6।।
( यायावर = घुमक्कड़ , nomad )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...