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Showing posts from November, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 246 - क़ब्र खोदने को ......

हैराँ हूँ लँगड़े चीतों सी तेज़ चाल लेकर ॥ चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल लेकर ॥ हुशयारों से न जाने करते हैं कैसे अहमक़ , आज़ादियों के चर्चे हाथों में जाल लेकर ॥ चलते नहीं उधर से तलवार , तीर कुछ भी , जाते हैं फिर भी वाँ सब हैराँ हूँ  ढाल लेकर !! हरगिज़ कुआँ न खोदें प्यासों के वास्ते वो , बस क़ब्र खोदने को चलते कुदाल लेकर ॥ माथे नहीं हैं जिनके उनके लिए तिलक को , कुछ लोग थालियों में घूमें गुलाल लेकर ॥ कुछ माँगने चला हूँ तो लाज़मी यही है , जाऊँ मैं उनके आगे मँगतों सा हाल लेकर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 245 - धूप क्या होती है

एक पतला जानकार पापड़ तला वो ॥ बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ॥ धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ? सुख के साये में हमेशा ही पला वो ॥ फूँककर पीता है गर जो छाछ को भी , दूध का होगा यक़ीनन इक जला वो ॥ है नहीं मँगता मगर जब जब भी आया , दर से मेरे कुछ लिये बिन कब टला वो ॥ जो मुकर जाता है अपनी बात से फिर , आदमी तो है मगर इक दोग़ला वो ॥ आज के हालात ने ही उसको बदला , कल तलक इंसान था इक सच भला वो ॥ राधिका उसको मिली कैसे हूँ हैराँ ? जबकि रत्ती भर नहीं है साँवला वो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 244 - जर्जर मकान

कल वो दिखती थी तुलसी आज पान लगती है ॥ सच में गीता तो वो कभी क़ुरान लगती है ॥ उसकी आवाज़ की लज़्ज़त की पूछ मत तारीफ़ , गंदी गाली भी उसकी इक अजान लगती है ॥ एक हम हैं कि बचपने में भी लगें बूढ़े , भर बुढ़ापे में भी वो नौजवान लगती है ॥ करती फिरती है निगाहों से सबके क़त्ल मगर , सख़्त हैराँ हूँ सबको अपनी जान लगती है ॥ लाजवाब है वो बेमिसाल है जुदा है वो , वो न इस जैसी न उसके समान लगती है ॥ है वो मज़्बूत क़िला , ताज सा महल अंदर , सिर्फ़ बाहर से वो जर्जर मकान लगती है ॥ जिसको देखो उसे ही चुप कराता फिरता है ,                                             मुझको वो बोलती भी बेज़ुबान लगती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति