ग़ज़ल : 243 - राख़ हो जाता है सब कुछ


  

   नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ।।
   गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।1।।
   ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में ,
   मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला ।।2।।
   कि पड़कर राख़ हो जाता है सब कुछ आग में मुझको ,
   भरी बारिश में जलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।3।।
   कई क़िस्से सुने लोगों से तलवारों से कटने के ,
   मुझे फूलों से कटने का किसी का वाक़िआ बतला ।।4।।
   तड़पकर भूख से मज्बूर हो इक शेर का कोई ,
   कहीं भी घास चरने का किसी का वाक़िआ बतला ।।5।।
    ( वाक़िआ = घटना , वृतांत )
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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