मुक्त-ग़ज़ल : 243 - राख़ हो जाता है सब कुछ.....


  
   नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
   गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
   ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में ,
   मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
   कि पड़कर राख़ हो जाता है सब कुछ आग में मुझको ,
   भरी बारिश में जलने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
   कई क़िस्से सुने लोगों से तलवारों से कटने के ,
   मुझे फूलों से कटने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
   बहुत मज़्बूर होकर भूख से जंगल के राजा हो _
   कहीं भी घास चरने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
    ( वाक़िआ = घटना , वृतांत )
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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