मुक्त-ग़ज़ल : 242 - महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥


गड़ता कम भुंकता बुरा हूँ ॥
पिन नहीं पैना छुरा हूँ ॥
एक सिर से पाँव दो तक ,
कोयले ही से पुरा हूँ ॥
हड्डियों सा हूँ कभी , कभी _
बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ॥
काठ का पहिया हो गर तुम ,
मैं भी लोहे का धुरा हूँ ॥
सबके दाँतों को हूँ कंकड़ ,
तुझ चबाने मुरमुरा हूँ ॥
सबको गंगा-जल उन्हे ही ,
महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥
अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब
मैं चुराने से चुरा हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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