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मुक्त-ग़ज़ल : 243 - राख़ हो जाता है सब कुछ.....

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नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में ,    मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    कि पड़कर राख़ हो जाता है सब कुछ आग में मुझको ,    भरी बारिश में जलने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    कई क़िस्से सुने लोगों से तलवारों से कटने के ,    मुझे फूलों से कटने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    बहुत मज़्बूर होकर भूख से जंगल के राजा हो _    कहीं भी घास चरने का किसी का वाक़िआ बतला ॥     ( वाक़िआ = घटना , वृतांत )    -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 242 - महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥

गड़ता कम भुंकता बुरा हूँ ॥ पिन नहीं पैना छुरा हूँ ॥ एक सिर से पाँव दो तक , कोयले ही से पुरा हूँ ॥ हड्डियों सा हूँ कभी , कभी _ बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ॥ काठ का पहिया हो गर तुम , मैं भी लोहे का धुरा हूँ ॥ सबके दाँतों को हूँ कंकड़ , तुझ चबाने मुरमुरा हूँ ॥ सबको गंगा-जल उन्हे ही , महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥ अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब मैं चुराने से चुरा हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति