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Showing posts from October, 2017

ग़ज़ल : 243 - राख़ हो जाता है सब कुछ

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नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ।।    गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।1।।    ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में ,    मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला ।।2।।    कि पड़कर राख़ हो जाता है सब कुछ आग में मुझको ,    भरी बारिश में जलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।3।।    कई क़िस्से सुने लोगों से तलवारों से कटने के ,    मुझे फूलों से कटने का किसी का वाक़िआ बतला ।।4।।    तड़पकर भूख से मज्बूर हो इक शेर का कोई ,    कहीं भी घास चरने का किसी का वाक़िआ बतला ।।5।।     ( वाक़िआ = घटना , वृतांत )    -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 242 - महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥

गड़ता कम भुँकता बुरा हूँ ।। पिन नहीं पैना छुरा हूँ ।।1।। एक सिर से पाँव दो तक , कोयले ही से पुरा हूँ ।।2।। हड्डियों सा हूँ कभी , मैं बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ।।3।। काठ का पहिया हो यदि तुम , मैं भी लोहे का धुरा हूँ ।।4।। सबके दाँतों को हूँ कंकड़ , तुम्हें , चबाने मुरमुरा हूँ ।।5।। सबको गंगा-जल उन्हेंं ही , महुए की कच्ची सुरा हूँ ।।6।। अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब मैं चुराने से चुरा हूँ ।।7।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति