मुक्त-ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी......



हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ॥
कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ॥
कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा ,
मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ॥
दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो ,
है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ॥
उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो ,
तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ॥
( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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