मुक्त-ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ



मग्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ॥
अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ॥
हो गया हूँ आज मीठा पान उनका ,
जिनको कल तक प्याज औ लहसुन रहा हूँ ॥
पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू ,
मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ॥
मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम - ढम ,
घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ॥
जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब ,
अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ?
जिसको पाने जान तक की की न पर्वा ,
आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ॥
जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे ,
दाल – गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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