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Showing posts from August, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 241 - मैं हूँ लोहे का चना

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राख़ को आग बनाने की न कर कोशिश तू ॥ मर चुका हूँ मैं जगाने की न कर कोशिश तू ॥ 1 ॥ मुझको मालूम है कितना तू भरा है ग़म से , दर्द हँस – हँस के छिपाने की न कर कोशिश तू ॥ 2 ॥ मैं तलातुम में किनारों से तो बचकर आया , मुझको फिर पार लगाने की न कर कोशिश तू ॥ 3 ॥ ऊँची मीनार से दे दे तू यक़ीनन धक्का , अपनी आँखों से गिराने की न कर कोशिश तू ॥ 4 ॥ मैं हूँ लोहे का चना मुझको समझकर किशमिश , अपने दाँतों से चबाने की न कर कोशिश तू ॥ 5 ॥ दिल मेरा भाग गया कब का चुराकर कोई , मुझको बेकार रिझाने की न कर कोशिश तू ॥ 6 ॥ ( तलातुम = बाढ़ ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी......

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हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ॥ कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ॥ कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा , मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ॥ दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो , है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ॥ उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो , तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ॥ ( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ

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मग्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ॥ अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ॥ हो गया हूँ आज मीठा पान उनका , जिनको कल तक प्याज औ’ लहसुन रहा हूँ ॥ पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू , मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ॥ मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम - ढम , घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ॥ जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब , अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ? जिसको पाने जान तक की की न पर्वा , आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ॥ जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे , दाल – गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ॥