Monday, August 28, 2017

ग़ज़ल : 241 - मैं हूँ लोहे का चना



राख़ को आग बनाने की न कर कोशिश तू ॥
मर चुका हूँ मैं जगाने की न कर कोशिश तू ॥ 1 ॥
मुझको मालूम है कितना तू भरा है ग़म से ,
दर्द हँस – हँस के छिपाने की न कर कोशिश तू ॥ 2 ॥
मैं तलातुम में किनारों से तो बचकर आया ,
मुझको फिर पार लगाने की न कर कोशिश तू ॥ 3 ॥
ऊँची मीनार से दे दे तू यक़ीनन धक्का ,
अपनी आँखों से गिराने की न कर कोशिश तू ॥ 4 ॥
मैं हूँ लोहे का चना मुझको समझकर किशमिश ,
अपने दाँतों से चबाने की न कर कोशिश तू ॥ 5 ॥
दिल मेरा भाग गया कब का चुराकर कोई ,
मुझको बेकार रिझाने की न कर कोशिश तू ॥ 6 ॥
( तलातुम = बाढ़ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, August 19, 2017

ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी



हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ।।
कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ।।1।।
कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा ,
मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ।।2।।
दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो ,
है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ।।3।।
उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो ,
तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ।।4।।
नाज़ुकी में वो गुलाबी पंखुरी से नर्म है ,
और सख़्ती में है कोहेनूर सी वो गुलबदन ।।5।।
( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, August 8, 2017

ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ



मग़्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ।।
अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ।।1।।
हो गया हूँ आज मीठा पान उनका ,
जिनको कल तक प्याज औ लहसुन रहा हूँ ।।2।।
पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू ,
मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ।।3।।
मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम-ढम ,
घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ।।4।।
जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब ,
अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ।।5।।
जिसको पाने जान तक की की न पर्वा ,
आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ।।6।।
जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे ,
दाल , गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...