मुक्त-ग़ज़ल : 238 - द्रोपदी न समझो ॥



बारिश में बहते नालों 
ख़ुद को नदी न समझो ॥
लम्हा तलक नहीं तुम 
ख़ुद को सदी न समझो ॥
अच्छे के वास्ते गर 
हो जाए कुछ बुरा भी ,
बेहतर है उस ख़राबी 
को कुछ बदी न समझो ॥
दिखने में मुझसा अहमक़ 
बेशक़ नहीं मिलेगा ,
लेकिन दिमाग़ से मुझ 
को गावदी न समझो ॥
पौधा हूँ मैं धतूरे 
का भूलकर भी मुझको ,
अंगूर गुच्छ वाली 
लतिका लदी न समझो ॥
जिसको वरूँगी मेरा 
पति बस वही रहेगा ,
सीता हूँ मैं मुझे तुम 
वह द्रोपदी न समझो ॥
(बदी = पाप , अहमक़ = भोंदू , गावदी = बेवकूफ़ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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