मुक्त-ग़ज़ल : 237 - दोपहर में रात



एक घटिया टाट से 
उम्दा वो मलमल हो गए ॥
हंस से हम हादसों में 
पड़के गलगल हो गए ॥
हो गए शीतल सरोवर 
बूँद से वो और हम ,
रिसते - रिसते टप - टपकते 
तप्त मरुथल हो गए ॥
शेर की थे गर्जना , 
सागर की हम हुंकार थे ,
आजकल कोयल कुहुक , 
नदिया की कलकल हो गए ॥
पार लोगों को लगाने 
कल तलक बहते थे जो ,
अब धँसाकर मारने 
वाला वो दलदल हो गए ॥
सच ; जो दिल की खलबली 
का अम्न थे , आराम थे ,
धीरे - धीरे अब वही 
कोहराम हलचल हो गए ॥
इक ज़रा सी भूल से हम 
उनके दिल से हाय रे ,
दोपहर में रात के 
तारों से ओझल हो गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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