मुक्त-ग़ज़ल : 236 - हिरनी जैसी आँखें



एक नहीं दो भी छोड़ो झुण्डों के झुण्डों की ॥
मेरे चूहे निगरानी करते हैं शेरों की ॥
जिनको आँखें रखकर भी कुछ सूझ नहीं पड़ता ,
मैं उनसे ज़्यादा इज़्ज़त करता हूँ अंधों की ॥
तुम उनको बातों से अब समझाना बंद करो ,
सख़्त ज़रूरत है उनको घूँसों की लातों की ॥
मुफ़्लिस का दीनो-ईमान न कुछ क़ीमत रखता ,
इस दुनिया में बात है तो बस दौलत वालों की ॥
सब पाकर भी रहती अंधों बहरों की ख़्वाहिश ,
हिरनी जैसी आँखें हाथी जैसे कानों की ॥
ऊँची-ऊँची डिग्री रखती हैं जो साथ अपने ,
अक्सर कम सुनतीं वो बहुएँ अपनी सासों की ॥
लाख तिजोरी खाली हो पर फिर भी होती है ,
उसको सख़्त ज़रूरत मोटे पक्के तालों की ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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