Sunday, July 2, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 235 - जब तक कि मैं न आऊँ



मुट्ठी में बारिशों का सब आब रोक लेना ॥
आँखों में आँसुओं का सैलाब रोक लेना ॥
जब तक कि मैं न आऊँ तुम रात में अँधेरी ,
सूरज को मात देता महताब रोक लेना ॥
हर चीज़ छिनने देना याँ तक कि मेरी जाँ भी ,
लुटने से सिर्फ़ दिल का असबाब रोक लेना ॥
जब मुझको अंधा करने आओ तो है गुज़ारिश ,
आँखों से गिरते मेरी कुछ ख़्वाब रोक लेना ॥
जब मैं रहूँ न ज़िंदा और मेरी याद आए ,
पीने से ख़ुद को दारू-जह्राब रोक लेना ॥
पर्दानशीं हूँ फिर भी ऐ काँच के मुहाफ़िज़ ,
मुझ पर हवस के फिंकते तेज़ाब रोक लेना ॥
( आब =पानी, महताब =चाँद, असबाब =सामान, जह्राब =विषजल, मुहाफ़िज़ =रक्षक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

No comments:

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...