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Showing posts from July, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 873 - कच्ची मिट्टी

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गलता बारिश में कच्ची मिट्टी वाला ढेला हूँ ॥ नेस्तोनाबूद शह्र हूँ मैं उजड़ा मेला हूँ ॥ देख आँखों से अपनी आके मेरी हालत को , तेरे जाने के बाद किस क़दर अकेला हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है

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खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है ॥ सच के कहने को तू सौ बार शर्म करता है !! जब तू बाशिंदा है घनघोर बियाबानों का ॥ क्यों तू मालिक है शहर में कई मकानों का ? तुझसे सीखे कोई सौदागरी का फ़न आकर ॥ आईने बेचे तू अंधों के शहर में जाकर !! दिल तिजोरी में करके बंद अपना बिन खो के ॥ इश्क़ करता तू यों सर्पों से नेवला हो के !! लोमड़ी आके तेरे द्वार पे भरती पानी ॥ तेरा चालाकियों में दूसरा कहाँ सानी ? तुझसा जीने का हुनर किसने आज तक जाना ? मैंने उस्ताद अपना तुझको आज से माना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 238 - द्रोपदी न समझो ॥

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बारिश में बहते नालों  ख़ुद को नदी न समझो ॥ लम्हा तलक नहीं तुम  ख़ुद को सदी न समझो ॥ अच्छे के वास्ते गर  हो जाए कुछ बुरा भी , बेहतर है उस ख़राबी  को कुछ बदी न समझो ॥ दिखने में मुझसा अहमक़  बेशक़ नहीं मिलेगा , लेकिन दिमाग़ से मुझ  को गावदी न समझो ॥ पौधा हूँ मैं धतूरे  का भूलकर भी मुझको , अंगूर गुच्छ वाली  लतिका लदी न समझो ॥

मुक्त-ग़ज़ल : 237 - दोपहर में रात

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एक घटिया टाट से  उम्दा वो मलमल हो गए ॥ हंस से हम हादसों में  पड़के गलगल हो गए ॥ हो गए शीतल सरोवर  बूँद से वो और हम , रिसते - रिसते टप - टपकते  तप्त मरुथल हो गए ॥ शेर की थे गर्जना , सागर की हम हुंकार थे , आजकल कोयल कुहुक , नदिया की कलकल हो गए ॥ पार लोगों को लगाने  कल तलक बहते थे जो , अब धँसाकर मारने  वाला वो दलदल हो गए ॥

मुक्त-ग़ज़ल : 236 - हिरनी जैसी आँखें

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एक नहीं दो भी छोड़ो झुण्डों के झुण्डों की ॥ मेरे चूहे निगरानी करते हैं शेरों की ॥ जिनको आँखें रखकर भी कुछ सूझ नहीं पड़ता , मैं उनसे ज़्यादा इज़्ज़त करता हूँ अंधों की ॥ तुम उनको बातों से अब समझाना बंद करो , सख़्त ज़रूरत है उनको घूँसों की लातों की ॥ मुफ़्लिस का दीनो-ईमान न कुछ क़ीमत रखता , इस दुनिया में बात है तो बस दौलत वालों की ॥ सब पाकर भी रहती अंधों बहरों की ख़्वाहिश , हिरनी जैसी आँखें हाथी जैसे कानों की ॥ ऊँची-ऊँची डिग्री रखती हैं जो साथ अपने , अक्सर कम सुनतीं वो बहुएँ अपनी सासों की ॥ लाख तिजोरी खाली हो पर फिर भी होती है , उसको सख़्त ज़रूरत मोटे पक्के तालों की ॥

*मुक्त-मुक्तक : 872 - इक भूल.........

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उनकी सब हरकतें यों थीं बेजा मगर , हम उन्हे हँस के माक़ूल कहते रहे ॥ बंद कर आँखें उनके गुनाहों को भी , छोटे बच्चों सी इक भूल कहते रहे ॥ उनके कंकड़ को नग ; मक्खी मच्छर को खग ; उनकी ख़स को शजर ; धूल - मिट्टी को ज़र ; उनको रखना था ख़ुश इसलिए झूठ ही , उनके काँटों को भी फूल कहते रहे ॥ (हरकत=चाल ,बेजा=अनुचित ,माक़ूल=उचित ,नग=रत्न ,खग=पक्षी , ख़स=सूखी घास ,शजर=वृक्ष ,ज़र=स्वर्ण ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 235 - जब तक कि मैं न आऊँ

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मुट्ठी में बारिशों का सब आब रोक लेना ॥ आँखों में आँसुओं का सैलाब रोक लेना ॥ जब तक कि मैं न आऊँ तुम रात में अँधेरी , सूरज को मात देता महताब रोक लेना ॥ हर चीज़ छिनने देना याँ तक कि मेरी जाँ भी , लुटने से सिर्फ़ दिल का असबाब रोक लेना ॥ जब मुझको अंधा करने आओ तो है गुज़ारिश , आँखों से गिरते मेरी कुछ ख़्वाब रोक लेना ॥ जब मैं रहूँ न ज़िंदा और मेरी याद आए , पीने से ख़ुद को दारू-जह्राब रोक लेना ॥ पर्दानशीं हूँ फिर भी ऐ काँच के मुहाफ़िज़ , मुझ पर हवस के फिंकते तेज़ाब रोक लेना ॥ ( आब =पानी, महताब =चाँद, असबाब =सामान, जह्राब =विषजल, मुहाफ़िज़ =रक्षक ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति