मुक्त-ग़ज़ल : 234 - कर गया हैराँ.......



दर्द को चुपचाप ही हमने सहा ;
आँख से आँसू न कोई भी बहा ॥
हम जो सुनना चाहते थे उसने वो ,
ना ज़ुबाँ से औ न आँखों से कहा ॥
बुझ गए हम उसको देते देते आँच ,
वो पिघलकर भी नहीं लेकिन बहा ॥
बात तो थी फूटकर रोने की सच ,
मुँह से फूटा जाने क्यों इक क़हक़हा ?
उससे करके दोस्ती पाला था इक ,
हमने सचमुच आस्तीं में अजदहा ॥
उसको है आवाज़ से नफ़्रत बड़ी ,
उसके कानों में न गा , मत चहचहा ॥
पाप धोना है तो पश्चात्ताप कर ,
सिर्फ़ गंगा–जमुना में ही मत नहा ॥
कर गया हैराँ वो बेबुनियाद घर ,
किस बिना पर जो ढहाए न ढहा ?
बस सका मैं उसकी आँखों में भी कब ,
वो हमेशा ही मेरे दिल में रहा ॥
( क़हक़हा = अट्टहास , आस्तीं = बाँह , अजदहा = अजगर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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